Monday, January 19, 2009

अपराजेय है फिलिस्तीनी जनता का प्रतिरोध

लिखने तक इजराइल ने युध्द विराम की घोषणा कर दी है । उसके कुछ ही घंटे बाद हमास ने भी संघषॻविराम का ऐलान कर दिया है । 27 दिसम्बर से इजराइली सेना ने गाजा पट्टी पर हमला कर फिलिस्तीनीयों का नरसंहार शुरू किया था । ख़बरों के आने तक लगभग 1100 फिलिस्तीनी मारे गएऔर 3000 की संख्या में घायल हो गये है । कहने की ज़रूरत नही है कि इजराइल इस तरह के हमले अक्सर जारी रखता है ...और अमानवीयता और बबॻरता की मिशाल कायम करता है । सारा खेल अमेरिका के इशारे पर और उसके दिए उन्नत हथियारो के जरिये होता है ...जिसका सबसे बड़ा निशाना अरब देश फिलिस्तीन है ...जो अपने मुक्ति और एक राष्टॺ के रूप में अपने अस्तित्व के लिए लगभग 60 वषोॻ से संघषॻ कर रहा है । फिलिस्तीनी जनता के बहादुराना संघषॻ को इजराइली के उन्नत हथियारो से कुचला नही जा सकता ....पिछले साठ दशक से तो यही देखा जा रहा है ...जितना बबॻर इजराइली हमला होता है फिलिस्तीनी जनता का प्रतिरोध उतना ही ताकतवर होता चला जाता है ...हमास और संगठित और शक्तिशाली दिखाई देता है... नवीनतम हमले से तो यही सावित हो रहा है ।
बहस छिड़ने से पहले ज़रूरी है कि इस हमले का कारण जाने । ऐसे तो दुनिया की मीडिया यही दिखा रही है कि हमास के राॅकेट से हमले के कारण इजराइल ने फिलिस्तीन पर हमला किया है लेकिन कुछ तात्कालिक और कुध दूरगामी कारण है जिससे शायद जानना जरूरी है । तात्कालिक कारण यह है कि 5 नवम्बर को इजराइली सेना ने गाजा में पांच हमास के कायॻकत्ताओं को पकड़ा और हत्या कर दी । उसके बाद गाजा पट्टी में बुनियादी वस्तुओं की आपूत्तिॻ की लाइनों को काटना शुरू कर दिया जिसके कारण पूरे गाजा में हालात बेहद खराब होने लगे । जिससे ऊब कर हमास ने इजराइल पर हमला करना शुरू किया । दुरगामी घटना 2005 की है । 2005 में इजराइल को गाजा पट्टी से अपना सेना हटाकर उसे फिलिस्तीनीओं के हवाले करना पड़ा । इसके दो कारण थे पहला था फिलिस्तीनी जनता का वीरता भराे संघषॻ और दूसरा कारण था इजराइल के शासक वगॻ का दो हिस्सो में बॅट जाना । एक धड़ा इजराइल के साथ युध्द को जारी रखना चाहता था और दूसरा हिस्सा समझौता करने के पॿ में था जो धड़ा इजराइली जनता की नुमाइदगी कर रहा था वह जनता इस संघषॻ से ऊब चुकी थी ...इजराइल का यह तबका डर और आतंक के साये तले जी रहा था और इससे मुक्ति चाह रहा था । बात फिर दोहरा रहा हूं कि पांच दशक के युध्द के बाबजूद फिलिस्तीन के अस्तित्व को कुचला नही जा सकता इसके लिए चाहे कितनी भी ताकत इजराइल या अमेरिका लगा ले । फिलिस्तीन जनता का संघषॻ अमर है और अमर रहेगा ।
असल में इजराइल को बसाये जाने और फिलिस्तीनीयों को उस जमीन से खदेड़े जाने का इतिहास सन 1948 से है । जब फिलिस्तीन को खदेड़ कर इजराइल देश अस्तित्व में आया ...और उसे गाजा में जाकर धकेल दिया । फलिस्तिनीयों को अपनी मूल भूमि से खदेड़े जाने का गम आज भी है जिसको लेकर संधषॻ है । यह सच है कि इजराइल के अस्तित्व के इतने वषॻ बीत जाने के बाद उसे खत्म नही किया जा सकता लेकिन उतना भी बड़ा सच यह है कि फिलिस्तीन एक वास्तविकता है जिसे अमेरिकी साम्राज्यवाद अपने हितो के मद्देनजर मान्यता नही देता और उसका दमन जारी रखता है । फिलिस्तीन का विजय अमेरिका और अरब दोनो देशों की जनता के बीच मुकाबले का सवाल है जिसकी वजह से समस्या का समाधान नही हो पा रहा है । इसका समाधान क्या हो सकता है यह एक अलग चचाॻ का विषय है ।
अब सवाल यह है कि क्या हमास को कोई इजराइली हमला खत्म कर सकता है । तमाम विश्लेषको को कहना है कि इजरायली हमले में वो ताकत नही है कि वह हमास को खत्म कर सके । हमास के पीछे फलिस्तीनी जनता की एक फौज खड़ी है ...साथ ही दुनिया को यह मालूम है कि फलिस्तीन,लेबनान और इराक ऐसे देश है जहां की जनता सेक्युलर विचार रखती है और आधुनिक है । जिसकी वजह है कि हमास अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजराइल के सामने मजबूती से डटा हुआ है ।
उत्तर यह भी है कि पूरी फिलिस्तीनी जनता को विश्व से समाप्त कर देना इजराइल की औकात के बाहर है । ऐसे में पूरे अरब में उसके और अमेरिकी दमन के खिलाफ वगाबत का ऐसा तूफान खड़ा हो जाएगा जो उन्हे मध्य-पूवॻ की जमीन से नेस्तनाबूद कर देगा । चूकि विश्व समुदाय में भी तमाम धूरिया सक्रिय है और उसके आपसी अंतॻविरोध है इसलिए ऐसे विद्रोह से निपट पाना अमेरिका और उसके भाड़े के टट्टू इजरायल के लिए नामुमकिन है । अगर कल्पना करे कि हमास को इजराइल खत्म कर देता है तब भी फलिस्तीनी जनता का प्रतिरोध कम नही होगा क्योकि जब हमास नही था तब भी फलिस्तीनी जनता लड़ रही थी और जब हमास खत्म हो जाएगा तो उससे भी ताकतवर संगठन उसकी जगह ले लेगा जैसा कि इतिहास दुहराता है । यही कहा जा सकता है कि फिलिस्तीन नामक सत्य को मिटाया नही सकता । अगर अमेरिका और इजरायल को अमन और चैन से जीना है तो उसे फिलिस्तीन को कुबूल करना ही होगा । नही तो आज हमास है कल और कोई रेडिकल तैयार होकर उनकी नींद ले उड़ेगा । नील गगन में उड़ने वाली आजाद चिड़ियां गुलामी की जंजीर कभी पसंद नही करती ,उसे तो खुला आसमान चाहिए । इस सच को विश्व समुदाय और अमेरिका इजरायल को समझना ही होगा । गुलामी की बेड़ी को कभी फिलिस्तीन पसंद नही कर सकता और न ही उसके प्रतिरोध को दुनिया की कोई ताकत दबा सकती है । उनका संघषॻ अमर है और एक सीख भी ।

Wednesday, January 14, 2009

सत्यम के बहाने आम लोगो के ददॆ को समझने की कोशिश

हैदराबाद की मशहूर कम्पनी सत्यम ने जो जालसाजी और ठगी का खेल दिखाया है उससे यह सावित हो गया है कि हमारे देश में भागवत गीता पर हाथ रखकर झूठ ुउगलवाने की जो प्रथा चल रही है उसमें कितनी सच्चाई है । मुझे नही लगता है कि गीता पर हाथ रखकर जो बोला जाता है उसमें दस प्रतिशत भी सच्चाई का अंश होताी है । खैर,मसला सत्यम का है जिसने एक चीज तो अवश्य सावित कर दिया है कि इस देश में सफेदपोश लोगो के लिए कोई बन्दीश और जेल की कालकोठरी नही होती,और न ही उसके दिल में सलाखों के पीछे होनेवाले यानताओं का कोई डर होता है । िसत्यम के संस्थापक राजू साहब के मामलें में यही इतिहास दोहराया जा रहा है । आम लोगो के निवेश उड़ गए ...राजू साहब माला माल हो गए ...लोकतंत्र होने का ददॻ तो गरीब लोगो को ही उठाना पड़ता है ।
अपने देश में ग़रीब लोगों के खिलाफ सबकुछ जायज है । अभी हाल ही में तो बीएमडब्लू कांड का फैसला सामने आया था जिसमें इस सच्चाई का खुलासा हुआ कि कैसे एक अमीर रईसजादे के बच्चे रात में शराब पीकर कार चलाते है और गरीबों और पटरी पर सो रहे लोगों को कुचलकर चले जाते है ,इसके बाबजूद अपना जुमॻ कुबूल नही करते है । संजीब नंदा का बयान और उसके उधोगपति पिता का इस मामलें में दखलअंदाजी किसी से छुपा नही है । उपहार कांड में 13 जून 1997 में बाडॻर फिल्म रिलीज का दिन भी लोगों के जेहन से हटा नही होगा ...इस कांड में कितने लोगो ने अपने जीवन की आखिरी फिल्म देखी ...इसमें जो फैसला आया वह भी लोगों से छुपा नही है और न ही अंसल बंधुओं का चरित्र ही लोगो से शायद छुपा होगा । आखिरकार उस मौत के लिए क्या हुआ और दोषियों को कितनी सजा मिली,आज भी अनसुलझी पहेली बनी हुई है । क्योकिं मरने वाले सारे लोग गरीब तबके के थे ...अंसल बंधुओं के उंची कद के आगे ये लोग बौने सावित हुए ....और सच को धोखा देती झूठ एक बार फिर जीत गई और सच हमेशा की तरह हार हुई ।
हषॻद मेहता और केतन पारीख जैसे महारथी ने कई हजार करोड़ रूपये का घोटाला कर लाखो लोगो को चूना लगा चुके है । असलियत यह है कि जितना बड़ा जालसाजी या फरेब होता है अपराधी उतनी ही तेजी से बाहर निकल जाता है और मुक्त भी हो जाता है । आम लोगो ंके हाथ में कुछ नही रह जाता है । इस तरह की कई घटनाए देश में होती रहती है और आम जनता इस चक्की में पिसते चले जाते है । राजू के सफरनामें में भी ऐसा ही लगता है । कभी आईटी कम्पनी के होनहार मानेवाले राजू बिल क्लिंटन तक के साथ मंच पर साथ नजर आए है ....राजनीतिक रसूख में वे प्रधानमंत्री तक की पहुंच रखते है...जैसा कि राजीव गांधी की मृत्यु के पश्चात जब नरसिंह राव देश के प्रधानमंत्री बने तो यह सच उजागर हुआ कि राजू के संबंध वहां तक थे । इसी राजनीतिक विरासत से आगे बढ़ने वाले राजू ने फिर पीछे मुड़कर नही देखा । और हर उंचाई को छुआ ।
लेकिन सत्यम कम्पनी में जो हुआ उसके बारे में किसी को कोई अन्देशा नही था । विशेषॾ भले इसे आथिॻक आतंकवाद करार दे रहे हों लेकिन सच्चाई यह है कि ेइस चक्की में पिसे जाने का डर किसी को नही ोहै । क्योकि आम जनता ही इसमें पिसी जाएगी । राजू किसी न किसी तरह बाहर आ जाएगे ...गीता की कसम खाकर वे सच्चाई का बखान भी कर देगे । लेकिन एक प्रश्न जो बार-बार जेहन में हिलकोरे मारता है कि आखिर सरकार का ये रवैया आम जनता के लिए क्यों है । सरकार पहले से चेत जाती तो इस तरह का कारनामा नही होता । हर घटना होने के पश्चात सच्चाई की खोज क्यो की जाती है । लगता नही है कि अब इस देश में सत्यमेव जयते का कोई अथॻ रह गया है ।

Monday, January 5, 2009

दिल्ली में कड़ाके के ठंढ़ के बीच चलती जिन्दगी

दिल्ली समेत देश के अन्य राज्यो में शीतलहर का कहर जारी है.....ठंढ़ और उसमें कोहरे के साथ चलते मंद पवन देवता भी लगता है कि ज़िगर में छेद करने आये है....मंद मुस्कान बिखेरती ये हल्की हवा बेवजह दांतों और पैरों को थिरकाने लगती है । सुवह के वक्त तो धुंध भी लगता है उसके साथ भाईचारा निभाने साथ खड़ा हो जाता है...सुवह के समय जल्द तैयार होने की जल्दी होती है...उसके लिए जल्द स्नान करना और आॅफिस के लिए तैयार हो जाना और भी ज़रूरी हो जाता है । यूं ही आजकल बाॅस आॅफिस लेट पहुंचने के ताने देते रहते है ....और काम पूरा नही होने की बात होती रहती है । थोड़ा देर हो जाने पर बाॅस की मुबाइल की घंटी बस में कोलाहल मचाना शुरू कर देता है । दुसरी और ये धुंध है जो थमने का नाम ही नही ले रहा है । सुवह के समय तो ये धुंध और हल्का अंधेरा कोट-पेंट वाले के अंदर भी सिहरने पैदा कर देता है । ख़ासकर आॅफिस जाने के वक़्त तो इसकी चचाॻेए-आम होती है । लोग-बाग आफिस लेट होने की दुहाई कोहरे को देते रहते है....कोई समय पर जग नही पाने का राग अलापता है तो कोई धुंध और ठंढ़ के कारण आलस्य को दुहाई देता है । आलम यही होता है कि सदॻ अपनी जगह हर लोगो के जेहन में बनाए ंरखती है और चचाॻ समाप्त होते-होते आॅफिस की डगर सामने दस्तक देने लगता है । लोग-बाग अपनी ड्यूटि निभाने और अपना काम पूरा करने में सब कुछ भूल जाते है...सिलसिला आजकल हर दिन जारी है ।
दरअसल ये दस्तूर उनके लिए जारी है जिनके पास सारा कुछ है ...पहनने के लिए अच्छे गमॻकपड़े है । कोटॻ,पेंट और टाई के बीच पवन देव को भी शरीर के भीतर जगह बनाने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है । फिर भी मौसम की मार और बदलते मिज़ाज की हर जगह गुफ्तगू है ...लेकिन वे बेख़बर है ...जिनके लिए न तो पहनने के लिए गमॻ कपड़े है न ओढ़ने के लिए गमॻ चादर ....सड़क के फुटपाथ पर आज भी जिन्दगी की शुरूआत होती है और भोर होने के साथ-साथ रात भी अपनी शबाब के साथ समाप्त हो जाती है.... और ये लोग वहीं के वही रह जाते है । इनके सर पर न तो कोई छत है न ही कोई जमीन ...इनके लिए तो सड़क के किनारे बने फुटपाथ ही खूबसूरत जगह है । अपनी लाचारी के मारे ये दूर के राज्यो से रोजी-रोटी की जुगार में यहां आये है । इन्हे क्या पता है कि इनके लिए यहां के हालात उतने आसान नही है ...यहां भी पहले मशक्कत करनी पड़ती है । बेचारे को नही मालूम है कि मंदी भी कोई चीज होती है । ये तो हालात के मारे यहां पहुंचे है बरना गांव में तो ये मालिक की भी बात नही मानते थे अनाज कम होने पर ही उनके खेतो में काम करने जाते थे । पूरी तरह स्वतंत्र और आजाद थे ॥लेकिन आज हालात ने इस कदर ठोकर मारी है कि शहर के छोटे मकान भी मयस्सर नही है । चांद पर हम पताका लहराने पहुंचे है ...लेकिन क्या पता कि चांद पर लगा धव्वा क्या इन्ही लोगो की वजह से लगा है सोचने और जानने की जरूरत है । ऐसे में चांद के क्या मायने है...जब अपना हर रोज साथ निभाने वाला ही चांद उदास है । पहले इस चांद के मुंह में निवाला डालने का प्रयास होना चाहिए । ठंढ़ तो उनके लिए है जिसके पास तन ढ़कने को कपड़े है और रूम में जलाने के लिए रूम हीटर है...और चलती गाड़ी में एसी लगी है...यहां का सारा काम प्रकृति के नही मालिक के मनमाफिक चलता है । लेकिन यहां तो सदॻ को दूर करने के लिए मुट्ठी ही काफी है । इन गरीवो ने अपनी मुट्ठी में ही ठंढ़ को कैद कर रखा है । इस व्यवस्था को पाटने की जरूरत है ।

Wednesday, December 31, 2008

नया साल आपके लिए नयी खुशिया लेकर आए

नया साल अपने आखिरी दहलीज पर पांव थामें खड़ा है...हमलोग रफ्ता-रफ्ता अपने अंदाज में इसे रूकसत करनेे को तैयार हैं। नए साल का ेइस्तक़बाल करने को आतुर है....और बांह पसारे खड़े है । चंद घंटों में साल 2008 गहरी नींद में सो जाएगी । नएा साल प्रभात की किरण के धरती पर आते ही लोगो के दिलों में कोलाहल मचाने लगेगी । आगमन के स्वागत की तैयारियां पूरू हो चुकी है...गोवा शिमला और विक्टोरिया पैलेस शैलानियों के आगमन से कसमकस हो चुका है । कहीं आधी रात की पाटीॻ का हलचल है। शहर मुम्बई फिल्मी अदाकाारा के जिस्मानी जलबे के साथ नए साल की सुगबुगाहट पाने को बेताब है। हलांकि प्रशासन के तरफ से यह हिदायत मिली है कि सुरॿा कारणों की बजह से रात बारह बजे के बाद किसी तरह की पाटीॻ न करें। लेकन नए साल के आगमन को लेकर लोगो के दिल में दिलचस्पी है जो अपने-अपने तरीके से भुनाना चाहते है ।
नए साल के आगमन और पुराने साल के विछड़ने का सिलसिला वषोॻ से चलता आ रहा है । मसलन बीते साल को हम विदा कर रहे है जो हमारे लिए कई यादो को अपने साथ सहेजे है । इस साल में हमने कई उपलब्धियों को हासिल किया तो कई धटनाओ ने हमारे जख़्म फिर से हरेे कर दिए । एक तरफ हमने अमेरिका-अमेरिका न्युक्लियर डील दुनिया के सामने सुपर पावर होोने का संकेत दिया ।ो दूसरी और चंदॺयान की सफलता ने हमारे वैॾानिको के वषोॻ से सॅंजाये सपने को साकार कर गया । चांद पर हमने तिरंगा लहराकर अपनी वैॾानिक कुशलता की पहचान दी । लोकतांंंंत्रिक प्रक्रिया में भी हमने सबसे बड़े लोकतंत्र होने का अहसास दुनिया को कराया है । जिसकी ताजा मिशाल जम्मू-कश्मीर चुनाव है । जहां मतदाताओ ने चढ-बढ़कर हिस्सा लिया । और दिखला दिया कि हम आतंक और दहशत के साये में जी कर भी लोकतंत्र में विश्वास रखते है । ऐसा पहली बार हुआ कि जम्मू-कश्मीर के मतदाताओ ने 69 से लेकर 60 प्रतिशत का मतदान किया । मतदान में महिलाओ के साथ-साथ पुरूषो ने भी महत्वपूणॻ भूमिका का निवाॻह किया ।जनता ने अपने मत से सरकार चुनकर अलगावादियो और अमन के दुश्मनों को करारा जबाब दिया है ।
इस साल खेल में भी हम किसी से पीछे नही रहे । बीजिंग ओलंपिक तो बस एक शुरूाआत रही ...उसमें भी भारतीय अभिनव,अखिल और विजेन्दॺ ने भारत का नाम रौशन किया । आगे यही तीनो अन्य भागेदारी के लिएें कमर कसे हुए है और नयी फसल भी तैयार कर रहे है।विश्वनाथन आनंद की बादशाहत आज भी बरकरार है । दुनिया के 64 खाने के बादशाह उनके सामने नतमस्तक हैं ।सचिन तेंदुलकर रूकने का नाम ही नही ले रहे है । रनो और शतकों के पहार के साथ-साथ रिकाडोॻ के पहार भी खड़े करते जा रहे है । हाॅल ही उसने लारा का रिकाडॻ तोड़ क्रिक्रेट में अपने नाम एक नई इबारत लिखी है ।धोनी जहां जाते है धूम मचा देते है । चाहे वन डे की कप्तानी हो या ट्वेंटी-टवेंटी या अब फिर टेस्ट की कप्तानी हर जगह धोनी की धूम है । खेल के हर ॿेत्र में इस साल हमने नई इबारत लिखी है।
कुल मिलाकर आतंकी हमलों के जख़्म को छोहकर साल 2008 हमारे लिए कामयाबी का साल रहा है । केवल आतंक के जख्म ने हमें हर बार झकझोरा है । हाल ही में मुम्बई में हुए आतंकी हमले ने हमारे देश के शान के ऊपर हमला किया है । लेकिन इसके लिए हम तैयार है और आतंकियों को हम हमले का माकूल जबाब देगे। राजनीति,खेल,और फिल्म से लेकर वैॾानिक ॿेत्र में हमने कामयाबी हासिल की है । वस यही सिलसिला नये साल में भी जारी रहे । नये साल में भारत और नई ऊचाई पर पहुंचे । नये साल के आगमन पर आपलोगों को हादिॻक धन्यवाद

Thursday, December 25, 2008

अमन के दुश्मन एक बार अपनी गिरेबाँ में झांक कर तो देखो

भारत एक लोकतांत्रिक देश है और विचारों की असहमति लोकतंत्र की सेहत व उसकी प्रामाणिकता की एक अनिवायॻ शतॻ मानी जाती है । हमलोग भी आम जिन्दगी में विचारो ंके असहमति और आदान-प्रदान को समाज और उससे जुड़े लोगो के लिए बेहतर मानते है । इससे संबंध प्रगाढ़ होते है और दूरिया कम होती है । लेकिन क्या हम उस परिस्थिति में ऐसी बेजुवानी टिप्पणी को पसंद करेगें जहां आतंकवाद के नाम पर पूरे देश और संसद में राष्टीॺय सहमति बन रही हो...उससे मुकाबला करने के लिए सभी दल एकजुट हो रहे हो। वैसी स्थिति में ए।आर। अंतुले के वयान से हम क्या आकलन कर सकते है राष्टीॺय सहमति पर लगी इस चोट का हवाला हम इसलिए दे रहे है क्योकि हमारे देश के लोकतंत्र में एक दुभाॻग्यपूणॻ स्थिति यह रही है कि यहां राष्टीॺय सहमति कभी बन नही पाती है इसलिए कई प्रयास सरकार की और से किये भी जाते है जो शायद दिखावा या सही भी हो सकता होै लेकिन इस बार ऐसा लगाा कि मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमलों के बाद पूरा देश और संसद एक साथ है । आतंकी ताकतो से मुकाबला करने का मन बना रही है । और वह कदम उठाने को तैयार है जो असली में न सही सियासत और कूटनीति की बिसात पर हीी लोकतंत्र को बचाने के लिए संभव हो । वैसी स्थिति में यह वयान किसी तरह से एक राष्टीॺय पाटीॻ के संसद को शोभा नही देता है बल्कि बेतुका नजर आता है ।
हमारा पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान बारूद के ढ़ेर पर टिका हुआ है । आतंकवादी संगठन ने देश को इस कदर जकड़ लिया है कि वहां सरकार नाम की कोई चीज नही है । सेना प्रमुख आईएसआई के मुखिया है जिनका काम ही पड़ोसी मुल्क में आतंक और दहशत फैलाना है लोगो का अमन चैन छीनना है ऐसे जनरल से हम किसी तरह की उम्मीद भी नही रह सकते है जो हमे ऐसी ताकतो से लड़ने में मदद करेंगे या यू कहें कि अपने देश में तालीम ले रहे आतंकवादी संगठनों पर किसी तरह का लगाम लगाएगे । पाकिस्तान का राष्टॺपति एक ऐसा व्यक्ति है जो खुद पाकिस्तान में मिस्टर टेन परसेन्ट के नाम से मशहूर है ।सारी दारोमदार जनरल परवेज अशफाक कियानी पर है जो शायद परवेज मुशॻरफ के देशी औलाद है क्योकि बिना आकलन के भारत जैसे देश को धमकी दे रहे है कि हम भारत का कड़ा विरोध करेगें । ऐसी स्थिति में देश का एकजुट होना देश के लिए एक संजीवनी का काम कर सकता है और विदेश नीति तक में सहायक हो सकता है ।
देश की एकजुटता की यह मिसाल है कि पाकिस्तान पहली बार इतनी दवाब की स्थिति में है ।ाअगर भारत विश्व जनमत को इस आतंक की जन्मभूमि पाकिस्तान के खिलाफ एकजुट करने में सफल हो पा रहे है तो यह इसी राष्टीॺय सहमति की वजह से संभव हो पाया है । आज पाकिस्तान दुनिया के सामने अपना वचाव नही कर पा रहा है तो यह इसी का परिणाम है । आज अंतुले ने करकरे की शहादत पर जो सवाल उठाकर छोटापन दिखाया है तो सेंध उस राष्टीॺय सहमति में लगी है जिसकी वजह है कि भारत पाक को विश्व अदालत की कटधरे में बंद नही कर पा रहा है । यह बात अंतुले को सोचना चाहिए ।
यह हमारी राष्टीॺय सहमति का ही नतीजा था कि हम जन्मजात शत्रु पाकिस्तान को 1965 और 1971 के युध्द में धूल चटा चुके है । 1962 में चीन के हाथो पराजय के बाबजूद हमारा राष्टीॺय मानस पराजय का नही बना । कारगिल में भारतीय जवान के कारनामें को शायद पाकिस्तान भूल नही पाया होगा । एक बार फिर हम हिंद देश की और से हुंकार भर रहे हैूं कि पाकिस्तान अपनी गिरेबां को झांक कर देखे । भारत तैयार है । क्योकि जब-जब इस देश पर दहशतगदोॻ ने हमला किया है हमने उसका माकूल उत्तर दिया है

Friday, December 19, 2008

अपनी इज्जत पर लगी चोट नासूर की तरह होती है

२६ नवम्बर के फियादीन हमलों ने देश की धड़कन मुम्बई को हिला दिया । देश में रफ्तार और तेज जिन्दगी पकड़ने के लिए मशहूर मुम्बई थोड़े समय के लिए ज़रूर थम गई । इस बार आतंकी ताकतो ने मुम्बई की शान माने जाने वाली ताज और नरीमन होटल पर हमला किया । जो मुम्बई में अपनी वैभवता के लिए जाना जाता है यू कहें कि मुम्बई की शान का प्रतीक माना जाता है । हमला तो शिवाजी टमिनल पर भी किया गया जहां लगभग ५६ सामान्य या यूं कहे कि दूर देश-प्रदेश कमाने वाले अधिकांश लोगो की मौत हुई । लेकिन ताज होटल में जो हत्या की गई उसमें देश के नामी गिरामी उधोगपति,पत्रकार,खिलाड़ी के ठहरने का प्रबंध होता है । जो देश की जान और शान माने जाते है । देश का दिल उसी के दिल से धड़कता है या मानो देश को गति के लिए संजीवनी मिलती है । मसलन मुम्बई में हुए इस हमले को खूब तूल दिया गया । टेलीविजन से लेकर अखबार तक के मीडिया मुगल ने कलमनसीबी का जोरदार मुजाहिरा किया । शायद अभी तक नामी-गिरामी लेखक मुम्बई में हुए हमले को पचा नही पा रहे है । एक बात तो सच है कि इस हमले ने यहां के शख्सियत को अंदर से हिला कर रख दिया है । इसलिए इस शहर के ब्रांड से लेकर फिल्मी कलाकार तक इस हमले का विरोध करने सामने आए । खुद शतकवीर सचिन तेंदुलकर ने अपने ४१वे शतक को मुम्बई में हुए हमलों के शहीद और पीडीत परिवारो के नाम किया । आम जनता का विरोध भी इस कदर हुआ कि शिवराज पाटिल और महाराष्ट सरकार तक को जाना पड़ा । लोग काफी संख्या में विभिन्न तरीके से विरोध किया चाहे मुमबत्ती जलाकर हो या अन्य माध्यम से लोगो ने अपना गुस्सा उताड़ा । लेकिन इस गुस्से में एक बात साफ दिख रही थी कि इस तरह का विरोध मुम्बई पर हुए हमलो के कारण हुआ । क्योंकि इसमें देश के बड़े आदमी की जाने गई थी । क्योकि शिवाजी टमिनल पर ५६ लोगो की हत्या को उतना तरजीह नही दिया गया था । बाद में इस घटनाओ को चैनल ने दिखाना शुरू किया । मामला जो हो इस हमले ने देश के सामने कई सवाल खड़े किए । देश में कहीं भी लोग अपने को महफूज नही मान कर चल रहे है । खास कर मुख्य स्थल पर ठहरना उचित तक नही है । महानगरो में लोग सर में कफन बांध कर जी रहे है । अमिताभ बच्चन अपने तकिये के नीचे पिस्टल लेकर सोते है । फिर यह हमले यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर चुक कहां से हो जाती है । क्यो आतंकी के मंसूबे सफल हो जाते है और हमारी खुफिया बाद में जांच का नाम लेकर अपना पल्ला झाड़ लेती है दशहतगदॆ अपने मकसद में कामयाब हो जाते है और हम हाथ पर हाथ घरकर बैठे रह जाते है । सुरछा के नाम पर बीआईपी का नाम लिया जाता है । बीआपी के लिए जितनी सेना लगी है उससे देश में अन्य हिस्सो को सुरछित किया जा सकता है ।५००००० सेना में लगभग १००००० सेना वीआईपी को बचाने में लगा रहता है । लेकिन फिर भी ये महफूज नही है । इसलिए तो मुम्बई में इतने बड़े नारे और भीड़ जमा हो रही है आखिर शान और शोहरत पर चोट लगी है ।

Thursday, December 11, 2008

सत्ता के सेमीफाइनल में कांग्रेस विजयी

पांच राज्यो के चुनाव परिणाम की गिनती ८ दिसम्बर को होनी थी । इससे पहले ही २९ नवम्बर को ख्त्म हुए चुनाव के बाद दिल्ली की चुनावी कचहरी आराम फरमा रही थी । बस इंतजार था कि परिणाम किसके राजसुख के नाम होगा । दिल्ली में शीला सरकार अपना अगला कायॆकाल फिर से आगे जारी रखेगी या सीएम इन वेटिंग विजय कुमार मलहोत्रा बाजी मार ले जाएगे । सुवह साढे छह बजे टेलीविजन का स्विच दबाने पर शीला अपने लांन में टहलती नजर आई । पत्रकारो की नजर उनके उपर गई मनाना शुरू कर दिया ,काफी मानमनौवल के बाद शीला ने एक प्रश्न का जबाब देने को हाजिर हुई । उससे जो जबाब आए उससे दिल्ली की तस्वीर साफ नही हो रही थी । शीला ने साफ तौर पर कहा था कि हम कंफिडेट नही है कि सरकार वना पाएगे या नही । उसके बाद अन्य चैनल भी दिल्ली में परिवत्तन की बात पर जोर दे रहे थे और कांग्रेस की तरफ से पसरे सन्नाटो से चुनाव का मिजाज टटोलने की कोशिश कर रहे थे । मलहोत्रा जी ज्यो ही पत्रकारों से मुखातिब हुए दिल्ली में अपनी पक्की जीत का दिलासा पत्रकारो और आम जनता को दिया । स्थिति किसी तरह से कांग्रेस के उलट ही दिख रही थी ।
राजस्थान ,मध्यप्रदेश औऱ छत्तीसगढ़ के चुनाव परिणाम का आकलन शायद लोगो को और चैनलो को पहले से था । इन राज्यो की स्थिति साफ नजर आ रही थी । राजस्थान में सिंधिया का जाना औऱ मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा का दुबारा बने रहना साफ दिखाई दे रहा था लेकिन दिल्ली की सुखॆ राजनीति बूढी हो चली कांग्रेस और बूढ़ी हो चुकी शीला के हाथो निकलने का डर कांग्रेसियो को शायद सता रहा था । लोगो से बातचीत में किसी ने यह नही बताया था कि कांग्रेस दुबारा सत्ता की खुश्बू ग्रहण कर पाएगी । भाजपा यहां कई मुद्दो को जीवंत बनाने की नकाम कोशिश में कोई कसर नही छोड़ी थी । डिनर से लेकर डिल्लोमेसी तक में हर जगह वह कांग्रेस को मात देने के लिए उग्र दिख रही थी । मुद्दे अहम थे । मंहगाई दिल्ली सरकार की विसात में सुराख डालने की तरह था । लोगो के रूह में प्रवेश करा दिया गया था कि मंहगाई सरकार की देन है और अब आम जनता का दिल्ली में रहना आसान नही है । आतंकी हमले केबिनेट से लेकर दिल्ली सरकार की कुसी तक हिला देने के लिए काफी था । शिवराज पाटिल के कपड़े बदलने ने का्ग्रेस की फजीहत करा दी थी । सीलिंग का मुद्दा पहले ही शीला सरकार की कमर तोड़ चुका था । लग रहा था कि दिल्ली के दुकानों में लगे ताले शीला सरकार के मुख्यालय में ताले लगवाने के लिए काफी है । हर तरफ से सरकार घिरती दिख रही थी । इतने के बाबजूद शीला ने स्टार न्यूज और अन्य चैनलो पर जज्बे को बनाए रखा था और मुश्किल भरे सवालो को जबाव आसानी से दे रही थी । हर जबाव विरोधियो को धराशायी करने के लिए काफी था । इस चुनाव में ज़नता ने एक चीजे साफ कर दी । विकास ने राजनीति के हर हथकंडे को नाकाफी सावित कर दिया । शीला के विकास,दिल्ली के गली-गली में सुख-सुविधा ने आम लोगो के विश्वास को बनाए रखा । शीला ने एक बार फिर भाजपा को बाहर का रास्ता दिखला दिया ।