Saturday, April 4, 2009

जनता की सेवा के लिए नेता या अपने जेब भरने के लिए नेता

हम कहां पहुंच गए है शायद हमें खुद पता नही है॥कभी सोचा नही गया था कि राजनीति को इस कदर व्यवसाय में बदल दिया जाएगा॥और इस व्यवसाय में भी इस तरह के व्यवसायी शामिल हो जाएगे जिनके नाम पर इतने सारे जुमॻ और मामले होगे...जिनका नाम हत्या,बलात्कार और देश के ईमानदार अफसरों की मौत में संलिप्त होगा । पैसा कमाना जिसका मुख्य धमॻ-कमॻ हो॥बंदूक जिसका ईमान हो । शायद भगत सिंह ने ही एक बार कहा था कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है॥भगत सिंह ने जिस तजॻ पर सत्ता को ंबंदूक की नली से निकलते बतलाया था...क्या उसका सही अथॻ यही है । सच मायने में खुद अगर अपने दिल से सवाल किया जाए कि आज के लोकतंत्र में चुनाव के क्या मायने हैं तो बहुत सारी चीजें सामने आ जाती है । चुनाव लड़ने का मतलब पैसे कमाना भर रह गया है...क्योकि ऐसी भी अब बात नही है कि जनता गलत या सही प्रत्याशी के बारे में समझती नही है । फिर लोकतंत्र को इस तरह से तार-तार किया जा रहा है फिर भी जनता खामोश क्यो है॥और अपने ॿेत्र में उस तरह के प्रत्याशी को मुहतोर जबाब क्यो नही देसबक सिखाने के लिए तो एक वोट ही काफी है फिर इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप निराधार नही लगता है कि यहां से एक ताकतवर या क्रिमिनल नेता चुनाव जीत कर आया है । आखिर इन नेताओं का चुनाव में जीतना कैसे संभव होता है...अपनी ताकत से या जनता के वोट से । अगर अपनी ताकत से तो लोकतंत्र हार रहा है अगर जनता की वोट से तो भी लोकतंत्र कमजोर हुआ है । फिर सवाल यह है कि आखिर कौन सी शक्तियां है जो लोकतंत्र को कमजोर और मजबूत बनाती है॥जो अभी भी अपने होने और न होने का अहसास कराती है। राजनीति का मतलब चुनाव से होता है । ऐसे चुनाव से जिसमें आम जनता अपने हिसाब से नेता का चयन करती है । जनता के आम राय से चयनित नेता जनता के प्रति वफादार होती है । ऐस ेशासन तंत्र का निमाॻण होता है जिसका मतलब जनता का शासन,जनता के द्वारा शासन और जनता के लिए शासन होता है । अब्राहम लिंकन का ये कथन शायद अब हमारे लोकतंत्र की गरिमा को चोट पहुंचाता है॥उसे लहुलुहान करता है । देश का सियासत इस कदर तैयार हो रहा है जिसमें सियासतदान चुनाव जीतने के मकसद से सारी हदों को पार कर जाता है...मजहब होता है चुनाव जीतना और सरकार बनाना । संजय दत्त को आयोग का नोटिस जाता है कि आप चुनाव नही लड़ सकते है । विहार में पप्पु यादव,सूरजभान सिंह और शाहबुद्दीन सरीखे ऐसे नेता है जो संसद की शोभा बढ़ा चुके है और अपना कायॻकाल भी पूरा कर चुके है । लेकिन इस बार के आयोग और न्यायालय के रवैये ने उन्हे चुनाव से दुर रखने का फैसला किया है । और ये नेता अब अपनी किस्मत का आजमाइश अपनी पत्नि के भरोसे कर रहे है उन्हे पता है कि पत्नि भी जीत जाये तो उनके शाही अंदाज और अदालती फरमानों से थोड़ी राहत जरूर मिलेगी और जनता के बीच अपना रसुख भी बना रहेगा । मकसद जनता की सेवा कतई नही है॥जनता की सेवा केवल संसद तक पहुंचने से नही होता है । बिना संसद भवन पहुंचे ही बहुत ऐसे शख्सियत है जो जनता की सेवा कर चुके है और कई पुरस्कर भी जीत चुके है और इतिहास में उनका नाम भी सादर अच्छरों में लिखा गया है॥उनकी निःस्वाथॻ सेवा मिशाल बन गई है । फिर चुनाव के आ जाने से यह सवाल जरूर उठता है कि जो नेता जनता के प्रति वफादार नही वे कैसे चुनाव जीत जाते है॥आखिर जनती ही तो उन्हे चुनती है । विहार का सिवान डाँ राजेन्दॺ प्रसाद के चुनाव ॿेत्र के नाम से जाना जाता था आज बाहुबली शाहबुद्दीन के नाम है...हिन्दुस्तान में मास्को के नाम से मशहूर बलिया लोकसभा ने सूरजभान जैसे प्रत्याशी को जीतकर भिजाया जिस पर सैकड़ो मुकदमें दजॻ है..संजय दत्त सजायाफता रह चुके है और उनका नाम मुम्बई बम विस्फोट जैसे संगीन मामलो में संलिप्त है...पोरबंदर को अब राष्टॺपिता महात्मा गांधी के जन्मस्थान और उनके सत्याग्रह से अधिक माफिया सरगना संतोखबेन जडेजा के नाम से जाना जाता है । चम्पारण भले गांधीजी की कमॻभूमि रही हो आज साधुयादव के काले कारनामो से जाना जाता है । वाराणसी,काशी और अय़ोध्या की धरती अब पवित्र नही रही इससे अधिक अब वह गुंडे और बदमाशो के लिए जाना जाता है इलाहाबाद नेहरू और लोहिया बच्चन के लिए नही बल्कि माफिया सरगना अतीक अहमद के नाम से जाना जाता है...सवाल यह है कि यह स्थिति आखिर कहां से आई है...जनता के अधिकार से या बाहुबली के अधिकार से । वोट देते वक्त हमे ंयही सोचना है क्योकि सूची इतनी भर नही है हकीकत यह है कि ज्यो-ज्यो राजनीति में विचार कमजोर पड़ते गए..अंदरूनी लोकतंत्र ग्याब होता गया और मूल्यो और सिध्दांतों का नेतृत्व हासिये पर चला गया । परिणाम यह हुआ कि राजनीति में आपराधिक तत्वों की भागीदारी और भूमिका बढ़ती गई और एक वगॻ इससे अपना रिस्ता दूर करता चला गया । अंत यहा तक आ पहुंचा कि इसमें ईमानदार लोग दूर-दूर तक दिखाई नही देते । समय के साथ-साथ इसका मतलब भी बदलता गया । आज राजनेता का असली अथॻ बााहुबली होना होता है...जनता का प्रतिनिधि नही... जनता का सेवक तो कतई नही...हमें वोट के वक्त यही सोचना है ।

Thursday, March 26, 2009

लोकसभा चुनावः क्या सच्चा लोकतंत्र यही है

15वीं लोकसभा का चुनाव सामने है सभी दल के उम्मीदवार अपनी ओर से जोर आजमाइश में लगे है ।अपने मोहरे पर विसात विछाने के लिए हर हथकंडे अपनाए जा रहे है । जाति, वगॻ और धमॻ को ताक पर रखकर उम्मीदवार तय किये जाते है । मकसद केवल जीत होता है । सियासी नेताओं को इसकी कतई चिंता नही है कि इस तरह के हथकंडे से किसी वगॻ या समुदाय की आत्मा को चोट पहुंचाया जाता है । राजनीति की इस चौसर में धमॻ का भी कोई मायने नही है॥राम से लेकर रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विध्वंस को भी चुनावी मैदान में धसीट कर लाया जाता है । ताकि जनता उसके नाम पर वोट देकर उम्मीदवार को भारी मतों से विजयी वनाये ।और राजनीति की रोटी आराम से सेकी जा सके । मुस्लिम समीकरण के नाम पर अपनी नैया पार कराना राजनीति की एक मयाॻदा हो चली है । इसलिए चुनाव के दस्तक देते ही कई ओसामा दिखने लगते है...और वोट की खेती शुरू कर देते है । लेफ्ट का वार हर चुनाव में नज़र आता है और देश को एक नई दिशा देने की बात होने लगती है । इससे पहले न कोई देशहित दिखता है और न ही प्रजाहित । इनके तो अंदाज ही निराले है संसद में गरीब पाटीॻ होने का तमगा ओढ़े रहते है और चुनाव सामने आते ही अपना घोषणापत्र जारी कर किसी दल से कम नही होने का एहसास कराते है । आखिर चुनावी घोषणापत्र में इतने पैसे कहां से आ जाते है । यही हमारी संसदीय राजनीति है जिसके सहारे भोले जनता को अगले पांच साल के लिए देश की दिशा तय करनेवाले दल को चुनना होता है...सवाल है आखिर किसे चुने...संसद से सड़क तक सभी नंगे है । फिर कहां है लोकतंत्र और कहां है उसके होने की मयाॻदा ।
लोकतंत्र को वोटतंत्र से लेकर नोटतंत्र में बदलने की कहानी भी काबिले तारीफ है । जब देश में पहली बार आम चुनाव 1952 में हुए तो वह पल भारतीय लोकतंत्र के लिए अतिविशिष्ट था । उस समय मतपत्र पर न तो उम्मीदवारों के नाम होते थे और न ही चुनाव में भाग लेनेवाले पाटिॻयों के चुनाव चिन्ह मतदाताओं को मिलनेवाला मतपत्र कागज का एक टुकड़ा होता था । मतदाता को इसे अपनी पसंद के उम्मीदवार के बक्से में डालना होता था । आडवाणी ने अपनी पुस्तक में जिक्र किया है कि कुछ उम्मीदवारों के एजेंट पोलिंग बूथ के बाहर खड़े होकर मतदाताओं से कहते थे अपना वोट बक्से में मत डालना । उसे जेब में डालकर हमार पास ले आओं उसके बदले हम तुम्हे एक रूपये का नोट देगें । बीस -पचीस ऐसे मतपत्र जमा हो जाने पर एजेंट का कोई आदमी अंदर जाकर अरने उम्मीदवार की पेटी में डाल देता था । और चुनाव की प्रक्रिया सम्पन्न हो जाती थी । इस बहस का जिक्र आडवाणी ने अपनी पुस्तक माई कंटीॺ माई लाइफ मे ंकिया है । सवाल है कि इस तरह की बहस से पीएम इन वेटिंग लोगो में क्या संदेश भेजना चाहते है । फिर बासठ सालों से हमार देश में लोकतंत्र होने का जो एहसास आम भारतीय को है उसका मूलमंत्र यही है फिर चुनाव में इतने पैसे खचॻ करने की क्या आवश्यकता है । संविधान विशेषॾ से जब मैने बात की तो उसने बताया कि चुनाव में जनता की अधिक से अधिक भागीदारी और जनता की इच्छा से चुनी गई सरकार ही सही लोकतंत्र होने की निशानी है । तो मेरा सवाल है कि क्या हम उस लोकतंत्र पर खड़े उतरे है ।
नोट देकर वोट खरीदना किसी से छुपा नही है॥अंतर केवल हैसियत की है उसी के हिसाब से पैसे दिये जाते है । और सीधी जनता के वोट को हड़प लिया जाता है॥जाति,वगॻ और धमॻ इसमें संजीवनी की तरह काम करता है । यह काम तो निचले स्तर पर होता है थोड़ा उपर जाने पर नेता किसी दल को समथॻन देने के लिए किस कदर सौदेवाजी करते है किसी से छुपा नही है । संसद में रूपये की गडडी बांटने का मामला अभी ताजा है फिर हम किस तरह के लोकतंत्र की नुमाइंदगी करते है । सवाल तो कई है॥आखिर इस तरह के लोकतंत्र के क्या मायने है । कही अपराधी तो कही सजायाफ्ता आखिर लोकतंत्र के यही मायने रह गये है...वोट देने वक्त हमे यही सोचना है ।

Monday, March 16, 2009

बारूद के ढ़ेर पर खड़ा है पाकिस्तान

सन 1947 ....अंग्रेजों की वषो की गुलामी की पीड़ा से मुक्ति के बाद एक साथ दो देश का जन्म हुआ। जो भारत और पाकिस्तान कहलाया । आजादी का अंतर केवल एक दिन का है....14 अगस्त को पाकिस्तान और 15 अगस्त को भारत । एक दिन के अंतराल ने भारत में एक कुशल नेतृत्व दिया और पाकिस्तान में एक अदद शासक । एक दिन के फासले ने भारत के गले में सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का तमगा लटका दिया और पाकिस्तान को बारूद के ढ़ेर पर ला खड़ा किया । 62 साल बीत चुके है॥भारत के लोकतंत्र ने ऊचाई पाई है....दुनिया के सामने मिसाल कायम किया है इसके बरअक्स पाकिस्तान में कभी सियासतदानो ने तो कभी हुक्मरानों ने तो कभी सेना ने अपने मकसद के लिए इसे तार-तार किया है । छह दशक से अपने लंबे काल में कभी सियासतदानों और कभी सेना ने इस मुल्क को कुचला है । और हर बार की तरह सेना के बूटों तले जम्हूरियत ने सिसकियां भरी है...और आज हालात ऐसे हो चले है कि फिर लोकतंत्र अपने आसुंओं पर रोनेवाला है लेकिन उसे पोछनेवाला दूर-दूर तक दिखाई नही दे रहा है ।
हालात के केन्दॺ में राष्टॺपति जरदारी,युसुफ रज़ा गिलानी और सेनाध्यॿ परवेज अशरफ़ कियानी है । अगर थोड़ा पीछे जाए तो मुशरॻफ से मुक्ति से पाकिस्तान को ज्यादा बक्त नही बीते है । काफी हंगामे और खूनखराबे के बीच वहां जम्हुरियत लौटी है...लोकतंत्र का सूरज उगने से पहले इस लोकतंत्र की आहट को जन-जन तक पहुंचाने वाली बेनजीर को रूकसत होना पड़ा । जरदारी साहब को यह कुसीॻ बेनजीर के फना हो जाने से मिली है...आज उसी लोकतंत्र का जरदारी उपहास कर रहे है और इस हालात पर ला खड़ा किये है जहां से पाकिस्तान विनाश के अलावा किसी पथ को नही चूम रहा है । हालात तो फिर बैसे ही होते जा रहे है । जो साल 2007 में थे ।
कियानी साहब को भी इस सत्ता के लिए मेहनत नही करना पड़ा । मुशरॻफ ने वफादारी के लिए उनको कमान दे दिया और जिन्दगी भर वफा का जामा लटका कर रहने को कहा । जिसके कारण शायद मुशरॻफ को अपने जान से हाथ नही गंवाना पड़ा । जैसा कि पाकिस्तान के इतिहास में रहा है कि कोई भी तानाशाह सेना का पद छोड़ने के बाद जिन्दगी नही जीया है लेकिन मुशरॻफ ने इतिहास पलटा है । नामालूम कियानी ने कितनी वफादारी दिखाई है मुशरॻफ को बचाने में । इतिहास ने तो यही सिखलाया है कि हर तानाशाह के साथ गद्दारी ही हुआ है । चलों मुशरॻफ साहब तो अभी जी रहे है ।
गिलानी कही फिंट नही बैठते है । हो सकता है कि वे कृपापात्र हो जिसकी बजह से पीएम की कुसीॻ तक पहुंच गए है । इस बीच पाकिस्तान का मामला फिर गरमा गया है । जजो की बहाली को लेकर जो विरोध शरीफ साहब ने किया था वह बीच में दुम हिलाने लगा था लेकिन फिर से वह मुद्दा तुल पकड़ने लगा है इसके बरअक्स हालात यह है कि शरीफ साहब ने यह ऐलान तब किया है जब उनके भाई को चुनाव लड़ने से रोका गया है । क्या शरीफ साहव ने इसी के कारण पूरे देश में आन्दोलन करने का ऐलान किया है जबकि कयानी ने राष्टॺपति जरदारी को तीन दिनो के भीतर पाक में हालात को ठीक करने को कहा है । क्या है फिर कियानी की पुराने तानाशाहों की पुनरावृत्ति तो नही है । या फिर भीतर से कुछ समझोता हो रहा है जो कियानी को इसके लिए तैयार कर रहा है ।
पता है कि पाकिस्तान ने अपने आधे से अधिक समय सेना के बदीॻ के तले जिया है । सेना ने यहां समय-समय पर आबाम को कुचला है और नागरिक को हर बंधनों से बंधने पर मजबूर किया है । तो क्या ताजा हालात इसी की और इशारा कर रही है ...क्या पाकिस्तान फिर सेना के चंगुल में जा रही है । जरदारी तो यह नही स्वीकारते है लेकिन सच्चाई यह भी है कि जरदारी को जो सत्ता मिली है उन्होने उसका दुरूपयोग ही किया है । शांति के नाम पर उन्होने पाक में कुछ नही किया है । फिर पाक में बेनजीर की हत्या पर मिली सत्ता से वे क्या हासिल करना चाहते है ॥समझ से परे है ।
शरीफ,जरदारी ,गिलानी और कियानी नायक है वत्तॻमान पाकिस्तान के...लेकिन यहा ंके सियासत की सबसे बड़ी दुविधा रही है कि नायक ही खलनायक की भूमिका में होते है । यही तो दस्तूर रहा है आजतक के पाकिस्तान का । हर एक की राजनीति के पीछे वहा की सियासत का इस्तेमाल किया गया है ।

Monday, March 2, 2009

महिला विधेयकः सियासी हलचल में टूटती जिम्मेवारी


देश ने आज़ादी के 62 बसंत देखे है....आजादी के बाद हमने दिखला दिया कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र है...लोकतंत्र होंने के तमाम गुण हममे समाहित है...इसके लिए हमने भारतीय संविधान के तमाम अधिकार और कत्तॻव्य का पालन करने का दंभ भरा है । खासकर आजादी और अधिकार के मामले में तो हम किसी से पीछे नही है । अपनी स्वतंत्रता किसे पसंद नही है इसलिए हमने आम जनता की स्वतंत्रता का तमाम ख्याल रखा कि कहीं इसके लिए हाहाकार न मच जाए और विश्व विरादरी के सामने भारत सीना तानकर लोकतंत्र का तमगा लाकर खड़ा रहे । यही सपना हमारे देश के रहनुमा का भी था और उसी को लेकर हम भी जीना चाहते है ।
आज़ादी तो मिल गई....लेकिन शायद अब तक आज़ादी का मायने समझ मे नही आया ।आज़ादी और अधिकार के नाम पर हमने खूब हल्ला मचाया। भागीदारी की बात की...लेकिन आधी आबादी को समान भागीदारी से कोसो दूर रखा । कभी असुरॿा तो कभी कमजोरी को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया । सामाजिक बंधन ने चौकट तक पहुंचने से रोका तो पदेॻ की ओट ने घर के भीतर रहने को मज़बूर किया । चाहरदीवारी ने कहीं मोम की मूत्तिॻ बने रहने को कहा तो रईसी ने कहीं मादकता की बस्तु समझकर दिल बहलाने भर को रहने दिया....कहीं अश्लीलता दम घुंट कर जीने को बेबश किये हुए है....तो कहीं हिंसा और शोषण ने जिस्म की बस्तु बन कर रहने को मजबूर किया है । लेकिन स्वतंत्रता की गूंज सात समुंदर पार तक जाती है ।े
चौदहवी लोकसभा 1738 घंटे तक चली । इसमें 423 घंटे हमने बेबज़ह हंगामे के कारण बबाॻद कर दिया । शेष समय काम में लगाया...अयोग्यता और हिंसा ने यहां भी हमारा पीछा नही छोड़ा।इसके बाबजूद हमने 258 विधेयक इस लोकसभा में पारित हुआ.....जो कानून बनकर तैयार है । पर हमारे सिसायत की त्रासदी यह भी रही है कि संविधान के 73वे और 74वे संशोधन के आधार पर हमने सन 1993 में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरॿण देने का फैसला लिया था । उसके बाद से इस विधेयक पर 46 बार लोकसभा में बहस हो चुकी है....और बहस केवल हंगामा बनकर रह गयी । हर बार हमने महिलाओं के नाम पर तगड़ा बबाल किया....लोकसभा में बहस की परिपाटी ही चला दी । नतीजा सिफर ही निकला ....मलाल सोमदादा को भी रहा जो अब लोकसभा कभी नही आएगें दादा ने भी कहा कि यह हमारे समय का दुभाॻग्य रहा कि हम इस बिल को पास नही करा पाये ।
ये तस्वीर है चौदहवी लोकसभा के परिणाम का । केवल 8 फीसद सांसद लोकसभा में आयी जो देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व कर रही है । न ही राजनीतिक दलों को महिला को सीट देने में दिलचस्पी रहे है और न ही महिलांए इसमें समुचित रूप से हिस्सा ले पा रही है । फिर हर दल में महिला प्रत्याशी का टोटा पड़ा हुआ है । लोकतंत्र का ताना हम खूब बुने....तमगा लगाकर हम खूब जिये लेकिन इस हकीक़त से भी इन्कार नही किया जा सकता है । जिसका ताजा उदाहरण महिला आरॿण बिल है जो आज भी सिसायत के बूटों तले सिसकिया भर रही है ।
सवाल यही खत्म नही होता है....सवाल उठेंगे तो जिम्मेवारी की बात भी होगी । इसके लिए असली रूप में दोषी कौन है । आरोप पुरूष प्रधान समाज के ऊपर लगाया जाता है । लेकिन असली मसला यही खत्म नही होता है । देश के सवोच्च पद पर महिलाएं आसीन है....सोनिया गांधी देश की सबसे ताकतवर महिला है...हैसियत शायद पीएम से भी ज्यादा की रखती है । प्रथम नागरिक की कुसीॻ पर प्रतिभा पाटिल विराजमान है.....तीन राज्य की मुख्यमंत्री महिला है...दिल्ली इससे अलग है इसे मिलाकर चार हो जाती है । और भी ताकतवर महिलाए राजनीति में हैं जो अपनी हैसियत का हवाला देती रही है और अपने को मजबूत कर भी दिखाया है । फिर क्या इन महिलाओं ने महिला विधेयक के लिए कोई बुंलंद आवाज लगाई है । कोई बहस छेड़ा है...किसी आन्दोलन के लिए तैयार हुयी है। अगर नही तो फिर यह आरोप भी निराधार है .... और न ही पुरूषों का हवाला दिया जाना चाहिए । अगर महिलाओं को महिलाओं से जलन है फिर यह सवाल तो छोड़ देना चाहिए । फिलहाल ऐसी गुंजाइश भी नही लगती है कि इस विधेयक को पास किया जा सकता है ।
आखिर कहीं न कही महिलाएं भी इसके लिए दोषी है । अपनी आजादी के लिए उसे भी खड़ा होना होगा ।

Wednesday, February 25, 2009

अब तो बाज़ार में बचपन भी बेचा जा रहा है

मेरी ख़्वाहिश है कि मै फिर से फरिश्ता हो जाऊ
मां से इस तरह लिपटू कि बच्चा हो जाऊ
कम से कम बच्चों के होठों के हंसी के खातिर
ऐसी मिट्टी में मिलाना मुझे कि खिलौना हो जाऊ
मशहूर शायर मुनब्बर राना की कलम से ये पंक्तियां निकली है ...राना ने अपने कलम के जरिये मां की ममता को लेकर एक बच्चे की ख्वाहिश को बयां किया है । राना के शब्दों में एक बच्चे की खुशी चंद खिलौने में है जिसमें अपना अक्स देखने के लिए वे खुद को मिट्टी में मिलाने की दुआ कर रहे है । ऐसी मिट्टी जिसे कोई मेहनतकश आकार देगा । कहने का तात्पयॻ यह है कि वह बच्चा बड़ा नही होना चाहता है...मां के गोद में ही खेलना चाहता है...मां से चंदा मामा की गीत सुनना चाहता है....और खिलौने में सिमटकर रहना चाहता है । लेकिन मनोरंजन चैनलों को शायद यह मंजूर नही है...लगता तो ऐसा है कि इन चैनलों ने बच्चे के बचपने को उससे छीन लिया है ....और हमारे दौर के बच्चे को बक्त से पहले बड़ा कर दिया है । उनका मचलता बचपन और खिलता मासूमियत टीआरपी के हवस में खोता जा रहा है....अब वे बच्चे नही है बल्कि कमाई का एक जरिया है....जिन्हे कामयाबी और निराशा का भार इसी उम्र में अपने कंधों पर लेकर चल पड़ना है । अब बचपन के कंधे कमजोर नही होते...उसे तो बुलंदी पर चढ़ने का भार बचपन में ही मिल जाता है...।
बात अपने अनुभव से ले रहा हूं । उस दिन रात के ग्यारह बजे हमारी उंगलिया रिमोट पर किसी पसंदीदा चैनल को ढ़ूढ़ रहा था कि अचानक मेरी उंगली एक मनोरंजन चैनल पर जा ठहरी । कुछ बच्चे दशॻकों को हंसाने की कोशिश कर रहे थे । इसमें एक ग्यारह साल की लड़की के जरिए काॅमेडी परोसी जा रही थी...बच्ची के कामेडि परोसने का नजरिया ऐसा था कि मै अपना पसंदीदा चैनल देखना भूल गया । बच्ची ने कहा कि हिन्दी फिल्म का एक डाॅयलाग आम है मै जरा गौर से सुनने लगा । बच्ची ने कहा कि सुनो मै तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली हूं । बच्ची ने आगे कहा कि निन्यानवे प्रतिशत हीरोइने ये डाॅयलोग शादी से पहले बोलती है । मै हतप्रभ था पर दशॻक और जज उस लड़की की बातो से लोटपोट हो रहे थे । तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बमुश्किल से एक नौ साल की लड़की स्टेज पर आई । उसने शोले फिल्म के एक डाॅयलांग की याद को ताजा करते हुए बोली कि हंगल साहब ने अपने एक डायलाग में कहा कि काश मेरे पास एक और बेटा होता जिससे मै रामगढ़ पर कुबाॻन होने के लिए दे देता ....इस बात को सुनकर रामगढ़ की महिलाओं ने हंगल साहब को कभी अपने घर नही बुलाने का फैसला लिया । काॅंमेडि के इस नजरिए को देखकर मै हैरान था ।
सिलसिला यही नही थमा.....सात साल की एक लड़की ने काॅमेडि को ऐसे अंदाज में पेश किया कि हमारी संस्कृति तार-तार हो गई....हमने जिस बचपन को बचपन समझ रखा था वह तो हमसे भी बड़ा निकला । हमने कभी सोचा नही था कि सात आठ साल की ये बच्चियां कभी मां बनने की भूमिका निभाएगी तो कभी अश्लील दृश्य के लिए अपने आप को तैयार करगी । डांस करना तो एक कला है लेकिन उसके माध्मम से अश्लीलता को परोसना इन बच्चियों के लिए कहां तक उचित है । गांव में तो छह सात साल तक की लड़कियां तो ठीक से स्कूल जाना शुरू नही करती है और न ही अपनी मां से अकेले होना चाहती है....फिर इस तरीके से स्किप्ट तैयार करना और उसे लाइट कैमरा एक्शन के जरिए दशॻकों तक परोसना ंनामुमकिन है लेकिन शहरी संस्कृति ने सब कुछ सही कर दिया है....अब तो शहर की लड़कियां पैदा होते ही बड़ी हो जाती है और सात आठ साल में ही सतरह अठारह साल की लड़कियों की तरह तामझाम और भूमिकाओं में नज़र आने लगी है ।
हमें बुलंदियों से कोई गुरेज नही है...हमारी तो तमन्ना है कि लड़कियां दस साल की दहलीज तक पहुंचते ही कल्पना चावला और सुनीता के रास्ते पर चल निकले । वैसा बनने के नक्शे कदम पर चले या उस उम्र तक वैसी हो भी जाये ...देश का नाम भी काफी हद तक रौशन होगा और हम भी उसे आगे बढ़ने के लिए तैयार रहेगे ...लेकिन यह तरक्की का कैसा जरिया है जो तरक्की पाने के लिए उस उम्र को खोता जा रहा है जिससे उम्र में फिर से लौटने की ख़्वाहिश अक्सर अपने साथियों और अन्य लोगों से सुनता रहता है...जो बचपन के बिताये पल को बयां करते नही थकते है । पर यहां तो बचपन को लूटा जा रहा है...उसे तार-तार किया जा रहा है जिसे खोने का गम न तो उन दुधमुंहे बच्चे-बच्चियों को है और न ही उनके मां-बाप को । आखिर क्या उसके खोतेे बचपन को लौटाया जा सकता है
मसलन बात यहां आकर अटक जाती है कि इसके लिए जिम्मेवार कौन हैं...वह नाबालिग बच्चे-बच्चिया या इनके जरिए काॅमेडी कायॻक्रम में अपने बच्चे की कामेडी पर दांत निपोरते उसके मां-बाप । आखिर किसी को तो यह जिम्मेदारी उठानी ही पड़ेगी । सबसे बड़ी बात तो उस उजार बचपन का है जिसे छीना जा रहा है .... उन बुलंदियों को चूमने के लिए जिस बुलंदी को उसके मां-बाप तमाम उम्र गुजारने के बाबजूद हासिल नही कर पाए और जो अपने बच्चे के जरिए सब कुछ हासिल करना चाहते है । लेकिन उन्हे यह नही पता कि उसके बुलंदियो से क्या छीनते जा रहे है । आखिर इन बच्चों को तैयार करना ...स्किप्ट याद कराना और पदॻ पर नामचीन कलाकारों के सामने परोसना ...क्या इस उम्र के लिए सही है । सबसे बड़ी बात तो बच्चों के सर पर दिखने वाला टेशन होता है जो उसके नाकामी के बाद साफ झलकता है । इन चैनलों को देखने वाले इस बात को जरूर गौर से देखे होगे या महसूस किये होगे । आखिर इस बच्चो को इस उम्र में ही इतनी बड़ा बोझ देने से क्या वे सचमुच बड़े हो जाएगे या एक बार कमजोर कंधे नाकामियों के दलदल में चले जाएगे.... मानसिक तनाव में बाद की जिन्दगी जीयेगे । समय के साथ जरूरी नही है कि सभी बच्चे को सफलता मिले फिर वैसी स्थिति में वे क्या करेगे । बाल अधिकार कानून समेत हम तमाम लोगों को इस और ध्यान देने और गंभीर होने की ज़रूरत है । ताकि बचपन को बचाया जा सके ।

Tuesday, February 17, 2009

जब चुनाव आयोग की अस्मिता ही खतरे में हो


भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है.....और यह पिछले साठ साल से सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का तमगा लेकर जी रहा है । लोकतंत्र को बनाए रखने और उसकी सेहत को मजबूत बनाए रखने के लिए जरूरी है कि आम जनता चुनाव में अधिक से अधिक संख्या में हिस्सा ले....और सरकार के गठन में अपनी समुचित भागीदारी तय करे । चुनाव में लोगो की भागेदारी को सुनिश्चित कराने के लिए तथा राजनीतिक दलो का चुनाव में पारदशिॻता बरतने के लिए चुनाव आयोग का गठन संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत 25 जनवरी 1950 को किया गया था । जो एक संविधानिक संस्था है जिसपर लोकसभा,राज्यसभा,विधानसभा,राष्टॺपति और उपराष्टॺपति तक के निवाॻचन की जिम्मेवारी होती है । साथ ही लोगो के बीच विश्वास बहाली के लिए साफ-सुथरा और स्वच्छ मतदान कराना भी आयोग का एक महत्वपूणॻ कत्तॻव्य होता है । संविधान की इसी प्रक्रिया के तहत सुकुमार सेन 21 माचॻ 1950 को पहले निवाॻचन आयोग नियुक्त किए गए और 1958 तक अपने पद पर बने रहे ।
सुकुमार सेन के बाद भी इस संविधानिक पद की गरिमा को संविधानिक प्रक्रिया के तहत सुसोभित किया जाता रहा ....और यह एक स्वतंत्र और निष्पॿ संस्था बनी रही । चुनाव से लेकर सभी मापदंडों में अपने पद का निवाॻह करती रही....इस पर न ही किसी तरह के आरोप लगे और न ही किसी तरह के गलत रवैये की शिकायत कही से की गई तात्पयॻ इसने अपने मद और मयाॻदा को कायम रखा । यह कवायद सन 1989 तक चलती रही....और देश में चुनाव आयोग के रूप में एक मुख्य चुनाव आयुक्त का गठन होता रहा ।
नब्बे के दशक से चुनाव आयोग के मामले में राजनीतिक पाटिॻयों ने दखल देना शुरू कर दिया ....मुख्य चुनाव आयोग के साथ दो और चुनाव आयुक्त का गठन किया जाने लगा । उसके बाद के समय में 12 दिसम्बर 1990 को टी।एन शेषण जैसा चुनाव आयुक्त देश को मिला जिसने इस पद और गरिमा को और आगे बढ़ाया । इससे अलग उसने आयोग में कई सुधार और मतदान संबंधी कई महत्वपूणॻ कदम भी उठाए । देश में पहली बार लोगो को आयुक्त के अधिकार और शक्ति का एहसास हुआा लेकिन राजनीतिक दलों की हिस्सेदारी ने इसे कमजोर करना प्रारंभ कर दिया और संसद में एक नए कानून लाकर 1993 में मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ दो अन्य आयुक्त के गठन का बिल संसद में पास कर दिया ।यह आयोग में राजनीतिक दखल और इसे कमजोर करने का एक अभिनव प्रयास था
अब राजनीति का प्रवेश इस कदर हो चुका है कि नवीन चावला और गोपालस्वामी के विवाद से समझा जा सकता है । नवीन चावला पर जहां कांग्रेस का सहयोगी होने और उसकी तजॻ पर चलने का आरोप लगता रहा है वही गोपालस्वामी भाजपा के शासनकाल में लालकृष्ण आडवाणी के गृहमंत्री के काल में सचिव के पद पर नियुक्त थे....और काफी सेवा दे चुके है । फिर तो दोनो का सियासी मामला साफ दिखाई दे रहा है । नवीव चावला को हटाने की मांग भाजपा काफी समय से कर रही है ....और वचाव में यूपीए सरकार के कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज तक आगे आ गए । फिर दोनो के मामलों से दिखता है कि दूध के घुले कोई भी नही है.....। फिर गोपालस्वामी ने चावला को हटाने की सिफारिश भी सरकार क सामने रख डाली । ताजा विवाद से जो मामला सामने आया उससे तो लगता है कि आयोग की अस्मिता ही अब खतरे में है । जब ऐसे पदों पर बने लोग भी इस तरह का विवाद खड़ा करने लगे तो चिंता की लकीर देश के सामने खींची जा सकती है । फिर जब लोकसभा का चुनाव दरवाजे पर दस्तक देनेवाली है वैसी स्थिति में आयोग का यह झगड़ा हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कितना मजबूती दे पाएगा यह सोचने का विवश करने लगा है । इससे भी ज्यादा जरूरी तो यह है कि जब आयोग एक साथ मिल जुल कर काम नही करेगंे तो क्या देश एक स्वच्छ मतदान की आस देख सकता है .... जब व्यवस्था को देखकर आंखो में आसू आ जाए तो उसके परिणाम के आने का कितना इंतजार किया जा सकता है .....फिलहाल तो दोनो आयुक्तो के बीच जंग जारी है ।

Saturday, February 7, 2009

आईपीएल की मंडी में सभी बिकने को तैयार हैं

केविन पीटरसन और ंएंडॺयू फ्लिंटाॅफ को राजस्थान और चेन्नई की टीम ने क्रमशः अपनी झोली में डाल लिया । अब ये खिलाड़ी आईपीएल की मंडी में सबसे मंहगे खिलाडी बन गए । इनकी दोनो की बोली 7।5 करोड़ रूपए में लगाई गई । इससे पहले यह ताज भारतीय टीम के युवा कप्तान महेन्दॺ सिंह धोनी के हाथ में था । और वे दुनिया के सबसे मंहगे खिलाड़ी धोषित हुए थे । अब धोनी पर पीटरसन और फ्लिंटाफ भारी पर गए । जिसकी आशंका बाजार में पहले से लगाई जा रही थी....बोली लगाने के लिए आएपीएल की सारी हस्तियां गोवा में जुटी हुई थी । इस बार शिल्पा शेटटी ने भी एक टीम खरीदी है...जूही भी शामिल हो गई है । इससे पहले केवल प्रीति जिंटा ने ही इसमें शिरकत की थी और मोहाली टीम का अपने हिस्से में रखा था । जो भी हो फिलहाल चचाॻ बोली को लेकर है ।
आईपीएल की मंडी में क्रिकेट को इस कदर ला खड़ा किया है कि यह क्रिकेट कम मनोरंजन ज्यादा दिखने लगा है । एक ऐसा खेल जो लोगो को फटाफट चोको-छक्कौ की बौछार दिखाए और देखने वाले भी तीन धंटे में अपने घर में आराम फरमाए ...मसलन यह दास्तान भी यहां जरूरी नही है ....लोगो को इस फारमेट के बारे में सारी जानकारी हासिल है । मसला है खेल का ंंमंडी में तब्दील होने का और उसमें ग्लैमर का समाहित हो जाने का । आखिर जेंटलमेन का गेम कही जाने वाले क्रिकेट को ऐसी ग्लैमर की हकलान क्यो आ पड़ी...कभी यह खेल सादगी का माना जाता था अब इसका स्थान चीयर लीडसॻ ने ले लिया है । भला जेटलमेन गेम को चीयर लीडसॻ का कैसा जुनून । इसी को समझने की जरूरत है ।
दरअसल क्रिकेट का यह गेम पैसे की मंडी बनता जा रहा है । जहां इसमें खिलाड़ियों के लिए पैसे की भरमार है तभी तो इसमें कमाई के लिए फिल्मी हस्तियों ने भी शिरकत करना शुरू कर दिया और पूरे फामेट को ही बदल डाला । पहले टीम चुनने के लिए विशेषॾ की टीम हुआ करती थी जो अपने हिसाब से टीम चुनती थी अब उनकी जगह शाहरूख खान।प्रीति जिंटा और जूही चावला जैसी सिने हस्ती ने यह काम शुरू किया है । यह न तो पदेॻ पर दिखलाने वाला क्रिकेट है और न ही लगान जैसे किरदार को निभाने के लिए बनाया गया सक्रिप्ट है .....आखिर यह कैसा क्रिकेट है .... जहां सब कुछ पैसे के खेल से होता है ।
क्रिकेट की मंडी में ढ़ल जाने का यह खेल बाज़ारबाद से शुरू होता है....जहां हर चीज की एक रकम होती है । और उसमें जाने वाले से लेकर हर समान तक बिकाऊ होती है ....अंतर बस केवल उसके महत्व का होता है । जिसमें जितनी छमता होती है उसका उतना बोली लगा दी जाती है .... बस बाजार का काम चलता रहता है ॥इसमें किसी तरह के विशेषता की बात नही होती है ...जैसे कहा जाता था कि सबकुछ पैसे से खरीदा जा सकता है उसकी शुरूआत देखने को मिल रहा है......फिर शमीॻदगी की बात तो वहां आती है जब खिलाड़ी बिकने को तैयार हो जाते है... भाई यह कैसी बिकने की प्रथा है.....उसमें भी गवॻ से बिकता है । खासा इंतजाम तो दशॻको के लिए भी होता है जिनका मनोरंजन के लिए चीयर लीडसॻ अपना बदन दिखाने को हाजिर रहती है और तरह-तरह से बदन की नुमाइश का मुजाहिरा करते है ..... कहने का मतलब है कि अब दशॻक भी बिक कर वहां पहुंचते है ....चौके -छक्कौ को देखने या जिस्म देखने का चस्का उन्हे लग गया है....अगर वाकई क्रिकेट तो फिर उनका क्या काम ।
जी बाजार में कुछ समझ में नही आता है ..... पता नही सड़को पर चलते हुए हम बिके हुए हो ...और शाम के वक्त ही हम अपनों के लिए हो .... बाकी बक्त को हम बाजार के चाकर है .... यह तो सब बिके हुए है । खरीददार की कमी नही है बस मौका तो दीजिए । लेकिन इस बाजारवाद ने सारी हदे पार कर दी है । फिर हम तो यही कह सकते है कि अपनी जमीर को मत बेचना बरना कुछ साथ में नही रह जाएगा ।