Saturday, June 6, 2009

प्रतिभा अपना स्थान खुद तलाश लेती है

बच्चे हमारे देश के भविष्य हैं...बच्चे के भविष्य बनने से न केवल देश बल्रल्कि एक परिवार,एक समाज तथा एक बेहतर भविष्य की संभावनाएं भी बन जाती है...एक बेहतर कल की बुनियाद के सहारे एक बेहतर इमारत की गुंजाइंश होती है..यही वजह है कि बच्चों के भविष्य को सवारने के लिए माता-पिता किसी तरह का समझौता नही करना चाहते है...खासकर शिॿा के नाम पर तो किसी तरह के समझौते करना तो बेहद ही मुश्किल हो जाता है । प्राइवेट या सरकारी किसी स्कूल में बच्चे का एडमिशन महत्वपूणॻ हो जाता है ।

बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ाई करे या प्राइवेट स्कूल में यह ज्यादा मायने रखने लगी है । इसके पीछे गुणवत्ता भी पीछे छुटने लगी है । एक तरफ खूबसूरत इमारत,चमचमाती दूधिया रौशनी में सुसज्जित कमरे,शानदार फऩीॻशिंग या कहे कि मूलभूत सुविधा से भी अधिक व्यवस्था है तो दूसरी और सरकार की मूलभूत व्यवस्थाएं है जो बच्चे के बेहतर गुणवत्ता के लिए किसी मायने में कम नही है । फिर भी हमारे देश में बढ़ रहे अभिजात वगॻ के लिए प्राइवेट स्कूल में बच्चे का एडमिशन कराना एक गौरव की बात है । इसमें वे अपनी शान भी समझते है...और रईसी का लेप भी इसमें मिला होता है । यही तो वह व्यवस्था है जो एक देश में दो भारत की कल्पना को उभारता है
लेकिन इस बार के नतीजे ने उन होसले को तोड़ा है कि केवल प्राइवेट संस्थान के बच्चे या ऊंची अभिजात वगॻ के सुख-सुविधा के धनी बच्चे ही अच्छे अंक हासिल कर सकते है । बाकी सब तो केवल पढ़ाई करने के नाम पर पढ़ाई करते है...लोग भी यह समझने लगे थे कि अच्छी गुणवत्ता तो केवल प्राइवेट विद्यालय में मिलती है । लेकिन इस बार के परिणाम ने उस मिथक को जरूर तोड़ा है और सरकारी विद्यालय के परिणाम ने प्राइवेट स्कूल को आईना दिखा दिया है ।

रांची के संजीत महतो की कहानी उन बच्चे के लिए काफी है । हजारीबाग के विद्यालय में रसोई का काम करके पढ़ाई भी जारी रखना संजीत के लिए कम आसान नही रहा । आजकल तो यही देखा जा रहा है कि पान की दुकान से अपना पेट गुजारा करनेवाले के बच्चे मेडिकल की परीॿा में टाॅप करते है और अपने पेट काटकर बच्चों की पढ़ाई में पैसा लगानेवाले लोगो के बच्चे अपना नाम रौशन करते है । फिर यह तो माना ही जाना चाहिए कि गुणवत्ता के नाम पर किसी तरह का भेदभाव करना बेकार है ।

विद्या के मन्दिर में प्रतिभा ही मुख्य पैमाना होता है । व्यवस्था भले ही सरकारी या प्राइवेट का ताना बाना देकर दोनो के बीच दूरी बनाने का काम करे लेकिन हकीकत यह है कि प्रतिभा वहीं छलकती है जहां प्रतिभान छात्रों का जमधट हो...सच यह है कि प्रतिभा अपना स्थान खुद तलाश लेती है ।

Monday, May 11, 2009

पप्पू वोट देकर क्या करेगा


आंखे खुली तो एफ एम रेडियो की गूंज कानों तक पहुंची । सुवह की फूटती किरणों के साथ पप्पू शोर मचाये हुए था ,इस बार पप्पू नही बनना है ॥वोट देने अवश्य जाएं नही तो पप्पू बन जाओगे । दिल्ली विधानसभा चुनाव के समय से ही ए।आर।रहमान की धुन पर इस विॾापन को दिल्ली की सड़को ,रेडियों,सिनेमाघर में प्रसारित किया गया था । उसके बाद से तो इस अभियान ने जोर पकड़ ली , ने केवल रेडियो या विॾापन के माध्यम से बल्कि आम जनता के बीच भी इस अभियान को प्रचार-प्रसार के माधयम से आगे बढ़ाया गया खास बात तो यह रही कि इसमें कई स्वयंसेवी संस्थाओं ने भी हिस्सा लिया और लोगो को पप्पू बनने से बचने के गुर सिखाता रहा । अब जबकि 15वी लोकसभा के चुनाव दिल्ली में हो रहे है पप्पू प्रचार यहां भी पीछे नही है । लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि आखिर चुनाव के वक्त ही पप्पू क्यो नज़र आता है...उससे भी बड़ा सवाल यह कि आखिर पप्पू वोट देकर क्या करेगा ?

यह लोकतंत्र की अजीबोगरीब स्थिति है कि एक तरफ पप्पू को पप्पू नही बनने देने से बचाने के लिए अभियान चल रहा है तो दूसरी और हर बार के चुनाव में मतदान का प्रतिशत कम होता जा रहा है । आम जनता में मतदान के प्रति उदासीनता बढ़ती जा रही है । भले ही युवाओं को रिझाने के लिए युवा नेता आगे आ रहे है लेकिन दूसरी तरफ युवा है जो पप्पू ही बने रहना चाहते है । लोकसभा चुनाव को ही आकलन के तौर पर ले तो पता चलता है कि 13 वी लोकसभा चुनावों में 60 प्रतिशत से कम लोगो ने मताधिकार का प्रयोग किया इनमें महिलाओं ने कुल वोटों का 55।64 प्रतिशत तथा पुरूषों ने 63।97 प्रतिशत मतदान किया था । उसी तरह 14वीं लोकसभा की स्थिति कमोवेश इसी तरह है जहां केवल 58।07 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने वोट का इस्तेमाल किया । इस बार के लोकसभा चुनाव में भी 55 से 60 फीसदी मतदाता ही उम्मीदवारों के किस्मत का फैसला करने जा रहे है । हाल में ही विधानसभा चुनाव को ही लिया जाय और उसमें भी अगर राष्टीॺय राजधानी दिल्ली की बात करे तो तथ्य चौकाने वाले है । दिल्ली का दॿिणी इलाका सबसे अधिक पढ़ा लिखा और उच्च वगॻ का है लेकिन पिछले तीन चुनावों मे यहां 35 से 40 प्रतिशत तक ही मतदान हुआ । फिर पप्पू बनने का अभियान किसके लिए चलाया जा रहा है ...जो जागरूक है ,सक्रिय है या जिनके ऊपर जागरूक करने की जिम्मेवारी है ।

पप्पू बनने का एक पहलू यह भी है कि अगर पप्पू विॾापन से प्रभावित होकर वोट देने के लिए तैयार होता है तो वोट किसे देगा । देश में हालात इस कदर खराब हो चुके है कि नेताओं और अपराधियों में फकॻ करना मुश्किल हो गया है । उदाहरण के तौर पर अगर दिल्ली विधानसभा को ही ले तो एक सवेॻ के मुताबिक 39 फीीसदी विधायक दागी है यानि राजधानी दिल्ली के विधानसभा में 91 विधायकों की पृष्ठभूमि आपराधिक है । आम चुनाव की स्थिति भी यही है । 14 वी लोकसभा के चुनाव में हर पांचवे में से एक सांसद की छवि आपराधिक थी । लगभग 21 प्रतिशत भाजपा के और 16 प्रतिशत कांग्रेस उम्मीदवारों पर क्रिमिनल केस दजॻ थे । 15वी लोकसभा में तय उम्मीदवारों की स्थिति भी यही है । 543 सांसदों में से 70 सांसदों के पर मामला दजॻ है उसमें से 40 सांसदों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले है । फिर ऐसी स्थिति मे पप्पू तैयार तो हो गया लेकिन वोट किसे देगा ।

ऐसा नही है कि पप्पू को वोट की अहमियत नही मालूम । लेकिन सच यह है कि पप्पू पप्पू बनने से पहले सियासी पाटिॻयों के प्रचार और एजेण्डे को गौर से निहारता है । पप्पू देखता है कि सभी राजनीतिक दल जनता को लुभाने के लिए लुभावने वायदे करने और कभी न पूरा होनेवाले नारे को गमॻजोशी से उछालता है । जिसमें सभी दल एक दूसरे को पछाड़ने की होड़ में लगे हुए है । कोई भी पा‍टी आम मेहनतकश जनता की जिन्दगी से जुड़े रोजगार,शिॿा ,स्वास्थय जैसी बुनियादी मुद्दों को नही उठा रहा है । पानी बिजली और सड़क का मुद्दा तो कब का ग्याब हो चुका है । आसमान छूती मंहगाई का मुद्दा विपॿी दलों ने भी उठाने की कोशिश नही की ....मुददे की जगह बकवास ने अपना स्थान बना लिया । ऐसी स्थिति में पप्पू उपापोह की स्थिति में है कि वह क्या करे आखिर पप्पू वोट किसे दे ।

मंहगाई जब आसमान छू रही है तो मंहगाई चुनावी मुद्दा क्यो नही बन पा रहा है । प्याज की बढ़ती कीमतोंं ने दिल्ली विधानसभा को ले उड़ा था फिर अभी तो सभी चीज की कीमत मंहगी है लेकिन यह तो मुददे से गायब है । एक तरफ अजुॻन सेन गुप्त कमेटी की रिपोटॻ है जिसमें भारत की 77 प्रतिशत आबादी 20 रूपए प्रतिदिन के हिसाब से गुजारा कर रही है,सोचने की बात यह है कि आसमान छूती मंहगाई में वह आबादी क्या खा रही होगी । दाल और सब्जी तो पहले ही गरीबों की थाली से गायब हो चुकी है और जो बचा है वह भी ग्याब होने की स्थिति में है । सवाल यह है कि फिर पेट की आग चुनावी मुद्दा क्यों नही बनता । आखिर पप्पू क्या करे ।

देश की स्थिति यह है कि एक तबका शेखी से पप्पू बने रहना चाहता है । यह वह तबका है जिसे मतदान या लोकतंत्र के महापवॻ से कोई मतलब नही है । वोट डालने डाॅक्टर, इंजीनियर ,पत्रकार या रईस उद्योगपति नही जाते है । उन्हे वोट देने जाने के वक्त कड़ी धूप लगती है । वोट डालने वही वगॻ जाता है जो गरीब है कमजोर है॥झुग्गी झोपड़ी जैसी मलीन बस्तियों में रहता है...और जहरीला पानी पीता है । लेकिन देश में विकास का माॅडल उन रईसो के लिए बनता है जिसके पास अपना आशियाना है । सड़के भी वही तक बनती है ताकि उनकी लम्बी गाड़ी उस पर फिसलन महसूस करे । विकास की पटरी वही जाकर समाप्त हो जाती है और 80 प्रतिशत जनता सड़क पर ही छूट जाती है ऐसी स्थिति में पप्पू को पप्पू बनना ही ज्यादा अच्छा लगता है ।

इस चुनावी उठापटक में एक चीज सामने आयी कि जनता का वोट देने में कोई विश्वास नही रह गया है । वह सोचने लगी है कि जीते कोई भी उसका किस्मत नही बदलने वाला है । उसका पेट कमाने से ही भरेगा, जो उम्मीदवार जीतेगा वह अपनी तिजोौरिया भरेगा फिर हम उसके लिए वोट डालने क्यों जाएं । हकीकत में वोट डालने का जुनून आस्था या किसी पाटीॻ को जीताने का मकसद बहाने कम लोगो को होता है । कुछ गरीब आबादी अपना पेट बेचकर जरूर वोोट डालता है उसके लिए यह महीना सीज़न कहलाता है कम से कम जीने के लिए नही तो पीने के लिए जरूर कुछ मिल जाता है । ऐसे में वोट डालने का क्या मकसद रह जाता है और किस मकसद से पप्पू केम्पेन चलाया जाता है । फिलहाल पप्पू यही सोच रहा है ।

Sunday, May 10, 2009

कुछ नही होगा तो आंचल में छुपा लेगी मुझे
मां कभी सर पे खुली छत नही रहने देती ।
आज मदसॻ डे है । मदसॻ डे के अवसर पे मुनब्बर राना की कलम से लिखी ये नज्म पेश कर रहा हूं । राना ने अपनी कलम से मां की ममता का जो बखान किया है वह काबिलेतारीफ है । बल्कि सच कहूं तो वे लोग खुशकिस्मत है जिनके पास मां है । मां के आंचल तले ॿमाशीलता,दशॻन और संस्कृति की जो विरासत मुझे मिली है उसे मै कलम के जरिये नही बयां कर सकता । मां कितनी खूबसूरत होती है जो बच्चे को जन्म देती है...पालती है ...और अपने आंचल के साये में पाल कर बड़ा करती है ।

कभी सोचता हू कि भगवान ने कितनी खूबसूरत दुनिया बनायी है...और इस दुनिया में एक मां भी बनाया है । मां के होने का एहसास किसे नही है । बचपन में चंदा मामा की वह कहानी याद नही है जिसमें मां लौरिया सुनाया करती थी...प्यार से खाना खिलाया करती थी...और स्कूल जाने के लिए तैयार करती थी । बचपन का वह एहसास आज भी याद है । स्कूल से लौटते वक्त मां क्या नही खिलाने का प्रयास करती थी ।

मां का काम यही खत्म नही होता है । मां की ममता मिसाल है जो अंत तक अपने बच्चों को खुश देखना चाहती है । यही वजह है कि रोज सुवह जगने के वक्त मां की ममता का एहसास जरूर होता है । तभी तो फिल्म दीवार से लेकर ए।आर।रहमान के आस्कर जीतने तक मां की बखान और गुनगान होता है । आज भी जिनके पास मां है उसे किस चीज की कमी है ।

Friday, May 1, 2009

चुनाव है तो छोटे दल भी अपना ताकत दिखा रहे है

लोकसभा चुनाव का तीसरा दौर पूर हो चुका है । 13 मई तक आखिरी दौर के लिए मतदान का समापन हो जाएगा । यह चुनाव का पांचवा और अंतिम दौर होगा । उसके बाद से सरकार के गठन के लिए सियासी गठजोड़ तेज हो जाएगा । कहने का तात्पयॻ यह है कि छठे दौर के लिए सियासी दल तैयारी में लगे हुए है । चुनाव का यही दौर है जब सियासी दल सरकार बनाने के लिए किसी हद तक गुजरने को तैयार हो जाते है । इस मायने में इस बार का लोकसभा चुनाव अनूठा है । देश के दो बड़े सियासी दल कांग्रेस और भाजपा में किसी दल को उम्मीद नही है कि वह अपने बूते सरकार का गठन कर पाएगी वैसे में गठजोड़ के जरिए ही शासन की सीढी तक पहुंचा जा सकता है । इस सीढ़ी को जो दल पा लेगा वही ताकतवर और चुनाव का असली पहेरूए माना जाएगा । कहने को तो इस बार के चुनाव में यह देखने को मिला कि हम अपनी अहमियत दिखाने के लिए चुनाव लड़े रहे है । जी हां लालू प्रसाद यादव रामविलास पासवान को साथ लेकर चुनाव लड़े रहे है । जिसके लिए उसने कांग्रेस को हाशिये पर धकेल दिया । कांग्रेस भी गठबंधन नही होने की स्थिति में अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए । लेकिन राजनीति की हद भी यही देखी । हर चुनावी सभा में लालू और पासवान ने कांग्रेस से इतर अपने लिए वोट मांगी लेकिन जनता को यह जरूर बताया कि सरकार कांग्रेस पाटीॻ की ही बनेगी और उसमें हमारा अहम रोल होगा । यही बात तो सियासत को महान बनाती है , इरादा है कांग्रेस के साथ सरकार बनाने का लेकिन अपनी अहमियत के आगे सारे गठबंधन धड़े के धड़े रह जाते है । आखिर अपनी ताकत का एहसास तो कराना है ।
सियासत के इसी पाठ को यूपी में भी देखा गया जब अमर सिंह की गिरगिटिया नीति के आगे गठबंधन नही हो पाया । और अकेले चुनाव लड़ने की नौवत आन पड़ी । अमर-लालू-पासवान की तिकड़ी तैयार हो गई । शायद उन्हे लगा कि तीनो मिलकर यूपी और विहार की अधिकतर सीटे जीत लेगे और सरकार बनाने के लिए कांग्रेस पर दबाब बनाएगे । मनमाफिक मंत्री पद भी मिलेगा और पाटीॻ भी ताकतवर हो जाएगी । किंगमेकर की भूमिका में जो ठहरे । लेकिन ताजा जो हालात दिख रहे है उससे तो नही लगता है कि मन की लालसा पूरी हो पाएगी । अभी पूरी तरह नही कहा जा सकता है कि परिणाम क्या आएगे लेकिन आसार कम ही है ।
सवाल साधारण है मूल में सियासत है जिसके ऊपर बहस होनी चाहिए । कमोवेश सभी राज्य की यही स्थिति है । पीएमके से लेकर जयललिता और मायावती इसी राजनीति के जरिए आगे आ रही है और अपने को ताकतवर करने में जुटी है । 1998 में एनडीए की सरकार बनी थी तो इन ताकतवर महिलाओं को राजनीति का जो पाठ अटल विहारी को पढ़ाया था शायद वो न भूलें । इसी के मूल में आकर 2004 में यूपीए की सरकार बनी और उस सरकार में शामिल बाम दलों ने राजनीति का जो पाठ कांग्रेस को सिखाया और अंत में जाकर सरकार से अलग हो गयी किसी से छुपा नही है ।
अब सवाल यह है कि सियासत के लिए राजनीतिक दलों का यह बदलाव भारतीय लोकतंत्र की सेहत के लिए कितना सही है । और यह सियासत लोकतंत्र को कितना मजबूत बना सकती है सोचने पर मजबूर करता है ।

Monday, April 13, 2009

अहम मुद्दे की तालाश में दुनिया का सबसे लड़ा लोकतंत्र

लोकसभा चुनाव की सरगमी तेज हो चली है । सभी सियासी दल मतदाताओं को रिझाने में लगे है । वोट केवल मुद्दा रह गया है । विकास का जो खांका देश में खीचा गया था वह हाशिये पर चला गया है सभी अपनी डफली बजाने को तैयार है...लेकिन इसके बीच लोकतंत्र के लिए सबसे बुड़ी खबर यह है कि लोकतंत्र में जो मुददे सामने आने चाहिए थे उन मुद्दो से न तो प्रत्याशी को और न ही जनता को किसी तरह का मतलब रह गया है ...वो वायदे हाशिये पर चले गए...जो चीजे सामने नही आने चाहिए थी वही मुख्य चुनावी डोर बन गई । जिसे लेकर लगाम की तरह खीचने की होड़ हर सियासी दलो में लगी हुई है ।
मसलन 15 लोकसभा चुनाव बिना किसी मुददे के लड़ा जा रहा है । भाजपा शुरूआत से किसी जानदार मुददे को तराश रही थी जिससे पूरे देश में शोर-शराबा हो...माहौल बिगड़े और जनता का रूझान किसी न किसी तरह उसके पॿ में जाये । इसलिए राम से लेकर अय़ोध्या में मन्दिर मनाने के हर वायदे को चुनावी फलसफा वनाकर तैयार करने की कोशिश की गई । फिर भी कोई हवा न मिली तो बरूण को एक सियासत के तहत जहर उगलने के लिए तैयार किया गया । पीलीभीत की जनता ने उकसावे में आकर तोड़-फोड़ सहित तमाम नाटक किए जिसकी स्क्रिप्ट संध और भाजपा के मदद से तैयार की गई थी । बरूण पर रासुका लगाा और साल भर तक बेल नही मिलने का फरमान भी आया । कहने का मतलब कि किसी न किसी बहाने भाजपा अपने रास्ते पर देर-सबेर चली आई । जिसकी तालाश उसे थी ।
सेक्युलर पाटिॻया भी कहां कम है । विकास के मुद्दे से अधिक ये दल अपनी टोपी दिखाने में वक्त जाया करती है । मुझे नही लगता है कि इन नेताओ को लाल टोपी से ज्यादा कोई सरोकार है लेकिन मुसलमानो का वोट जो लेना है इसलिए किसी जनसभा में इसके बिना पहुंच ही नही सकते...यही तो सेक्युलर होने की पहचान है । इसलिए तो कोई ऐसा दल नही है जो इन्हे रिझाने का जुगत नही करता है । भला भाजपा के धमॻध्वजधारी के साथ समझौता ही क्यो न हो...बाबरी मस्जिद गिराने के हीरो के साथ आपसी तालमेल क्यो न हो लेकिन ये टोपी लगी रहनी चाहिए । सियासी जुगत अपनी जगह है ।
तीसरे मोचेॻ की क्या रणनीति है । किस आधार पर जनता को अपनी तरफ खीच रहे है । है कोई मुद्दा...परमाणु डील के विरोध में क्रांग्रेस से अपना नाता तोड़ा था क्या इस बार कांग्रेस का साथ नही निभाएगे । गठबंधन में शामिल नही होकर क्या विपॿ की भूमिका में होगे या संशोधनवाद की तजॻ पर और पाटीॻ से तालमेल करेगे । मुद्दे कुछ भी नही है...सिंगुर का मामला दफन हो चुका है । नैनो गुजरात में तैयार हो रही है॥ममता की गली में बामपंथ की खोज चल रही है...ऐसा ही हाल केरल में भी है। अन्य राज्यो में तो किसान मजदूर हैं ही नही॥फिर ये किस आधार पर जनता से वोट मांग रहे है।
दाल रोटी हर दल की अपने प्रदेश में चल रही है । गठबंधन की राजनीति ने दिल्ली का दरवाजा हर दल को दिखला दिया है । इसमें कोई कमजोर नही है । चार सांसदो को जितवाकर मंत्री का पद आराम से ले सकते है । बस मोल-भाव की कला होनी चाहिए । इसीलिए तो कोई दल किसी तरह का कसर नही छोड़ना चाहती है...यही तो सियासत है ।
बाक युध्द शुरू हो चुका है । कांग्रेस बूढी दिख रही है और भाजपा युवा॥हर कोई अपने को नौजवान दिखाने की जुगत में है॥कोई युवाओ का हृदय सम्राट बनना चाहता है तो कोई हिन्दुओं का हृदय सम्राट । सबके अपने-अपने चादर है जिसमें वो मतदाताओं को गोलबंद कर रखना चाहते है । इस वाकयुध्द में न तो किसी के बोल का कोई मोल है और न ही इसकी कद्र । बस लोगों का दिल जीतना है । अभी रोलर चलने और कानून की हथकड़ी डलवाने में कोई परहेज नही है । चुनाव की ही तो बात है फिर तो एक ही सिक्के के दो भाग होकर रहना है ।

Saturday, April 4, 2009

जनता की सेवा के लिए नेता या अपने जेब भरने के लिए नेता

हम कहां पहुंच गए है शायद हमें खुद पता नही है॥कभी सोचा नही गया था कि राजनीति को इस कदर व्यवसाय में बदल दिया जाएगा॥और इस व्यवसाय में भी इस तरह के व्यवसायी शामिल हो जाएगे जिनके नाम पर इतने सारे जुमॻ और मामले होगे...जिनका नाम हत्या,बलात्कार और देश के ईमानदार अफसरों की मौत में संलिप्त होगा । पैसा कमाना जिसका मुख्य धमॻ-कमॻ हो॥बंदूक जिसका ईमान हो । शायद भगत सिंह ने ही एक बार कहा था कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है॥भगत सिंह ने जिस तजॻ पर सत्ता को ंबंदूक की नली से निकलते बतलाया था...क्या उसका सही अथॻ यही है । सच मायने में खुद अगर अपने दिल से सवाल किया जाए कि आज के लोकतंत्र में चुनाव के क्या मायने हैं तो बहुत सारी चीजें सामने आ जाती है । चुनाव लड़ने का मतलब पैसे कमाना भर रह गया है...क्योकि ऐसी भी अब बात नही है कि जनता गलत या सही प्रत्याशी के बारे में समझती नही है । फिर लोकतंत्र को इस तरह से तार-तार किया जा रहा है फिर भी जनता खामोश क्यो है॥और अपने ॿेत्र में उस तरह के प्रत्याशी को मुहतोर जबाब क्यो नही देसबक सिखाने के लिए तो एक वोट ही काफी है फिर इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप निराधार नही लगता है कि यहां से एक ताकतवर या क्रिमिनल नेता चुनाव जीत कर आया है । आखिर इन नेताओं का चुनाव में जीतना कैसे संभव होता है...अपनी ताकत से या जनता के वोट से । अगर अपनी ताकत से तो लोकतंत्र हार रहा है अगर जनता की वोट से तो भी लोकतंत्र कमजोर हुआ है । फिर सवाल यह है कि आखिर कौन सी शक्तियां है जो लोकतंत्र को कमजोर और मजबूत बनाती है॥जो अभी भी अपने होने और न होने का अहसास कराती है। राजनीति का मतलब चुनाव से होता है । ऐसे चुनाव से जिसमें आम जनता अपने हिसाब से नेता का चयन करती है । जनता के आम राय से चयनित नेता जनता के प्रति वफादार होती है । ऐस ेशासन तंत्र का निमाॻण होता है जिसका मतलब जनता का शासन,जनता के द्वारा शासन और जनता के लिए शासन होता है । अब्राहम लिंकन का ये कथन शायद अब हमारे लोकतंत्र की गरिमा को चोट पहुंचाता है॥उसे लहुलुहान करता है । देश का सियासत इस कदर तैयार हो रहा है जिसमें सियासतदान चुनाव जीतने के मकसद से सारी हदों को पार कर जाता है...मजहब होता है चुनाव जीतना और सरकार बनाना । संजय दत्त को आयोग का नोटिस जाता है कि आप चुनाव नही लड़ सकते है । विहार में पप्पु यादव,सूरजभान सिंह और शाहबुद्दीन सरीखे ऐसे नेता है जो संसद की शोभा बढ़ा चुके है और अपना कायॻकाल भी पूरा कर चुके है । लेकिन इस बार के आयोग और न्यायालय के रवैये ने उन्हे चुनाव से दुर रखने का फैसला किया है । और ये नेता अब अपनी किस्मत का आजमाइश अपनी पत्नि के भरोसे कर रहे है उन्हे पता है कि पत्नि भी जीत जाये तो उनके शाही अंदाज और अदालती फरमानों से थोड़ी राहत जरूर मिलेगी और जनता के बीच अपना रसुख भी बना रहेगा । मकसद जनता की सेवा कतई नही है॥जनता की सेवा केवल संसद तक पहुंचने से नही होता है । बिना संसद भवन पहुंचे ही बहुत ऐसे शख्सियत है जो जनता की सेवा कर चुके है और कई पुरस्कर भी जीत चुके है और इतिहास में उनका नाम भी सादर अच्छरों में लिखा गया है॥उनकी निःस्वाथॻ सेवा मिशाल बन गई है । फिर चुनाव के आ जाने से यह सवाल जरूर उठता है कि जो नेता जनता के प्रति वफादार नही वे कैसे चुनाव जीत जाते है॥आखिर जनती ही तो उन्हे चुनती है । विहार का सिवान डाँ राजेन्दॺ प्रसाद के चुनाव ॿेत्र के नाम से जाना जाता था आज बाहुबली शाहबुद्दीन के नाम है...हिन्दुस्तान में मास्को के नाम से मशहूर बलिया लोकसभा ने सूरजभान जैसे प्रत्याशी को जीतकर भिजाया जिस पर सैकड़ो मुकदमें दजॻ है..संजय दत्त सजायाफता रह चुके है और उनका नाम मुम्बई बम विस्फोट जैसे संगीन मामलो में संलिप्त है...पोरबंदर को अब राष्टॺपिता महात्मा गांधी के जन्मस्थान और उनके सत्याग्रह से अधिक माफिया सरगना संतोखबेन जडेजा के नाम से जाना जाता है । चम्पारण भले गांधीजी की कमॻभूमि रही हो आज साधुयादव के काले कारनामो से जाना जाता है । वाराणसी,काशी और अय़ोध्या की धरती अब पवित्र नही रही इससे अधिक अब वह गुंडे और बदमाशो के लिए जाना जाता है इलाहाबाद नेहरू और लोहिया बच्चन के लिए नही बल्कि माफिया सरगना अतीक अहमद के नाम से जाना जाता है...सवाल यह है कि यह स्थिति आखिर कहां से आई है...जनता के अधिकार से या बाहुबली के अधिकार से । वोट देते वक्त हमे ंयही सोचना है क्योकि सूची इतनी भर नही है हकीकत यह है कि ज्यो-ज्यो राजनीति में विचार कमजोर पड़ते गए..अंदरूनी लोकतंत्र ग्याब होता गया और मूल्यो और सिध्दांतों का नेतृत्व हासिये पर चला गया । परिणाम यह हुआ कि राजनीति में आपराधिक तत्वों की भागीदारी और भूमिका बढ़ती गई और एक वगॻ इससे अपना रिस्ता दूर करता चला गया । अंत यहा तक आ पहुंचा कि इसमें ईमानदार लोग दूर-दूर तक दिखाई नही देते । समय के साथ-साथ इसका मतलब भी बदलता गया । आज राजनेता का असली अथॻ बााहुबली होना होता है...जनता का प्रतिनिधि नही... जनता का सेवक तो कतई नही...हमें वोट के वक्त यही सोचना है ।

Thursday, March 26, 2009

लोकसभा चुनावः क्या सच्चा लोकतंत्र यही है

15वीं लोकसभा का चुनाव सामने है सभी दल के उम्मीदवार अपनी ओर से जोर आजमाइश में लगे है ।अपने मोहरे पर विसात विछाने के लिए हर हथकंडे अपनाए जा रहे है । जाति, वगॻ और धमॻ को ताक पर रखकर उम्मीदवार तय किये जाते है । मकसद केवल जीत होता है । सियासी नेताओं को इसकी कतई चिंता नही है कि इस तरह के हथकंडे से किसी वगॻ या समुदाय की आत्मा को चोट पहुंचाया जाता है । राजनीति की इस चौसर में धमॻ का भी कोई मायने नही है॥राम से लेकर रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विध्वंस को भी चुनावी मैदान में धसीट कर लाया जाता है । ताकि जनता उसके नाम पर वोट देकर उम्मीदवार को भारी मतों से विजयी वनाये ।और राजनीति की रोटी आराम से सेकी जा सके । मुस्लिम समीकरण के नाम पर अपनी नैया पार कराना राजनीति की एक मयाॻदा हो चली है । इसलिए चुनाव के दस्तक देते ही कई ओसामा दिखने लगते है...और वोट की खेती शुरू कर देते है । लेफ्ट का वार हर चुनाव में नज़र आता है और देश को एक नई दिशा देने की बात होने लगती है । इससे पहले न कोई देशहित दिखता है और न ही प्रजाहित । इनके तो अंदाज ही निराले है संसद में गरीब पाटीॻ होने का तमगा ओढ़े रहते है और चुनाव सामने आते ही अपना घोषणापत्र जारी कर किसी दल से कम नही होने का एहसास कराते है । आखिर चुनावी घोषणापत्र में इतने पैसे कहां से आ जाते है । यही हमारी संसदीय राजनीति है जिसके सहारे भोले जनता को अगले पांच साल के लिए देश की दिशा तय करनेवाले दल को चुनना होता है...सवाल है आखिर किसे चुने...संसद से सड़क तक सभी नंगे है । फिर कहां है लोकतंत्र और कहां है उसके होने की मयाॻदा ।
लोकतंत्र को वोटतंत्र से लेकर नोटतंत्र में बदलने की कहानी भी काबिले तारीफ है । जब देश में पहली बार आम चुनाव 1952 में हुए तो वह पल भारतीय लोकतंत्र के लिए अतिविशिष्ट था । उस समय मतपत्र पर न तो उम्मीदवारों के नाम होते थे और न ही चुनाव में भाग लेनेवाले पाटिॻयों के चुनाव चिन्ह मतदाताओं को मिलनेवाला मतपत्र कागज का एक टुकड़ा होता था । मतदाता को इसे अपनी पसंद के उम्मीदवार के बक्से में डालना होता था । आडवाणी ने अपनी पुस्तक में जिक्र किया है कि कुछ उम्मीदवारों के एजेंट पोलिंग बूथ के बाहर खड़े होकर मतदाताओं से कहते थे अपना वोट बक्से में मत डालना । उसे जेब में डालकर हमार पास ले आओं उसके बदले हम तुम्हे एक रूपये का नोट देगें । बीस -पचीस ऐसे मतपत्र जमा हो जाने पर एजेंट का कोई आदमी अंदर जाकर अरने उम्मीदवार की पेटी में डाल देता था । और चुनाव की प्रक्रिया सम्पन्न हो जाती थी । इस बहस का जिक्र आडवाणी ने अपनी पुस्तक माई कंटीॺ माई लाइफ मे ंकिया है । सवाल है कि इस तरह की बहस से पीएम इन वेटिंग लोगो में क्या संदेश भेजना चाहते है । फिर बासठ सालों से हमार देश में लोकतंत्र होने का जो एहसास आम भारतीय को है उसका मूलमंत्र यही है फिर चुनाव में इतने पैसे खचॻ करने की क्या आवश्यकता है । संविधान विशेषॾ से जब मैने बात की तो उसने बताया कि चुनाव में जनता की अधिक से अधिक भागीदारी और जनता की इच्छा से चुनी गई सरकार ही सही लोकतंत्र होने की निशानी है । तो मेरा सवाल है कि क्या हम उस लोकतंत्र पर खड़े उतरे है ।
नोट देकर वोट खरीदना किसी से छुपा नही है॥अंतर केवल हैसियत की है उसी के हिसाब से पैसे दिये जाते है । और सीधी जनता के वोट को हड़प लिया जाता है॥जाति,वगॻ और धमॻ इसमें संजीवनी की तरह काम करता है । यह काम तो निचले स्तर पर होता है थोड़ा उपर जाने पर नेता किसी दल को समथॻन देने के लिए किस कदर सौदेवाजी करते है किसी से छुपा नही है । संसद में रूपये की गडडी बांटने का मामला अभी ताजा है फिर हम किस तरह के लोकतंत्र की नुमाइंदगी करते है । सवाल तो कई है॥आखिर इस तरह के लोकतंत्र के क्या मायने है । कही अपराधी तो कही सजायाफ्ता आखिर लोकतंत्र के यही मायने रह गये है...वोट देने वक्त हमे यही सोचना है ।