Friday, May 1, 2009

चुनाव है तो छोटे दल भी अपना ताकत दिखा रहे है

लोकसभा चुनाव का तीसरा दौर पूर हो चुका है । 13 मई तक आखिरी दौर के लिए मतदान का समापन हो जाएगा । यह चुनाव का पांचवा और अंतिम दौर होगा । उसके बाद से सरकार के गठन के लिए सियासी गठजोड़ तेज हो जाएगा । कहने का तात्पयॻ यह है कि छठे दौर के लिए सियासी दल तैयारी में लगे हुए है । चुनाव का यही दौर है जब सियासी दल सरकार बनाने के लिए किसी हद तक गुजरने को तैयार हो जाते है । इस मायने में इस बार का लोकसभा चुनाव अनूठा है । देश के दो बड़े सियासी दल कांग्रेस और भाजपा में किसी दल को उम्मीद नही है कि वह अपने बूते सरकार का गठन कर पाएगी वैसे में गठजोड़ के जरिए ही शासन की सीढी तक पहुंचा जा सकता है । इस सीढ़ी को जो दल पा लेगा वही ताकतवर और चुनाव का असली पहेरूए माना जाएगा । कहने को तो इस बार के चुनाव में यह देखने को मिला कि हम अपनी अहमियत दिखाने के लिए चुनाव लड़े रहे है । जी हां लालू प्रसाद यादव रामविलास पासवान को साथ लेकर चुनाव लड़े रहे है । जिसके लिए उसने कांग्रेस को हाशिये पर धकेल दिया । कांग्रेस भी गठबंधन नही होने की स्थिति में अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए । लेकिन राजनीति की हद भी यही देखी । हर चुनावी सभा में लालू और पासवान ने कांग्रेस से इतर अपने लिए वोट मांगी लेकिन जनता को यह जरूर बताया कि सरकार कांग्रेस पाटीॻ की ही बनेगी और उसमें हमारा अहम रोल होगा । यही बात तो सियासत को महान बनाती है , इरादा है कांग्रेस के साथ सरकार बनाने का लेकिन अपनी अहमियत के आगे सारे गठबंधन धड़े के धड़े रह जाते है । आखिर अपनी ताकत का एहसास तो कराना है ।
सियासत के इसी पाठ को यूपी में भी देखा गया जब अमर सिंह की गिरगिटिया नीति के आगे गठबंधन नही हो पाया । और अकेले चुनाव लड़ने की नौवत आन पड़ी । अमर-लालू-पासवान की तिकड़ी तैयार हो गई । शायद उन्हे लगा कि तीनो मिलकर यूपी और विहार की अधिकतर सीटे जीत लेगे और सरकार बनाने के लिए कांग्रेस पर दबाब बनाएगे । मनमाफिक मंत्री पद भी मिलेगा और पाटीॻ भी ताकतवर हो जाएगी । किंगमेकर की भूमिका में जो ठहरे । लेकिन ताजा जो हालात दिख रहे है उससे तो नही लगता है कि मन की लालसा पूरी हो पाएगी । अभी पूरी तरह नही कहा जा सकता है कि परिणाम क्या आएगे लेकिन आसार कम ही है ।
सवाल साधारण है मूल में सियासत है जिसके ऊपर बहस होनी चाहिए । कमोवेश सभी राज्य की यही स्थिति है । पीएमके से लेकर जयललिता और मायावती इसी राजनीति के जरिए आगे आ रही है और अपने को ताकतवर करने में जुटी है । 1998 में एनडीए की सरकार बनी थी तो इन ताकतवर महिलाओं को राजनीति का जो पाठ अटल विहारी को पढ़ाया था शायद वो न भूलें । इसी के मूल में आकर 2004 में यूपीए की सरकार बनी और उस सरकार में शामिल बाम दलों ने राजनीति का जो पाठ कांग्रेस को सिखाया और अंत में जाकर सरकार से अलग हो गयी किसी से छुपा नही है ।
अब सवाल यह है कि सियासत के लिए राजनीतिक दलों का यह बदलाव भारतीय लोकतंत्र की सेहत के लिए कितना सही है । और यह सियासत लोकतंत्र को कितना मजबूत बना सकती है सोचने पर मजबूर करता है ।

5 comments:

mark rai said...

badhiya vivechan..rajniti ki achchhi samajh rakhte hai...aaj gathbandhan ke yug me chhote chhote dalon ka importance kaaphi badh gaya hai ...ye regionalism ki raajniti karte hai jisase bhaaat ki unity par khatra utpann ho gaya hai ...

अमिताभ श्रीवास्तव said...

dheeraj,
likhte bahut gambhir ho..mudde ki baat bhi kahte ho, yahi ek patrakaar ki nishani he lihaza sandeh karne jesi koi baat bhi nahi he..
desh me jis tarah kai dharm, kai jaatiya he ab thik usi tarz par rajniti hoti jaa rahi he..//kai partiya// yah hamare samvidhan ki galti he yaa sudharko ki???jo bhi ho isase bachne ke sabhi tantra moujud he baavzood iske kaanoon lachilaa he...//
yadi kade kadam uthate hue 2 partiya hi rakhi jaaye to? kher..swapn he//ab esa hi chalega aour ese hi mahol me hame rahna hoga.

Harsh said...

rajneeti ka achcha vishleshan kiya hai apne shukria...

BrijmohanShrivastava said...

दुष्यंत जी ने कहा था
मसलहत आमेज होते हैं सियासत के कदम
तू न समझेगा सियासत तू अभी इंसान है

hem pandey said...

इस सरकार के बनने में छोटे दलों की महत्वपूर्ण भूमिका नजर आ रही है, जो शुभ संकेत नहीं है. क्योंकि छोटे दलों और उनके नेताओं की प्राथमिकताएं संकीर्ण नजर आ रही हैं. जैसे मायावती प्रधान मंत्री बनने के लिए और मुलायम सिंह मायावती को पदच्युत करने के लिए. किसी से भी हाथ मिला सकते हैं